Site Network: Home | shuaibsamar | Gecko and Fly | About

न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश (त्वरित न्यायालय) कक्ष सं0-3, बरेली।

उपस्थित: श्री विनय खरे, (एच0जे0एस0)

1- सत्र वाद सं0- 242/07

राज्य बनाम सैयद मुबारिक
धारा 124 (क) भा.द.सं.
थाना - सी0बी0 गंज, बरेली
मु0अ0सं0-1240/06

2- सत्र वाद सं0- 790/07

राज्य बनाम सैयद मुबारिक
धारा 205, 419 भा.द.सं.
थाना - सी0बी0 गंज, बरेली
मु0अ0सं0-1240/06

निर्णय

सत्र वाद सं0 242/07 अपराध सं0 1240/06 धारा 124(क) भा.द.सं. में थाना सी0बी0गंज, जिला बरेली द्वारा अभियुक्त सैयद मुबारिक के विरूद्ध धारा 124(क) भा.द.सं. में आरोप-पत्र पे्रषित करने पर तथा दिनांक 15.2.07 को तत्कालीन न्यायिक मजिस्टेªट तृतीय, बरेली द्वारा सत्र सुपुर्द करने पर तथा दिनांक 30.3.07 को तत्कालीन माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बरेली द्वारा विधिपूर्ण निस्तारण हेतु इस न्यायालय में अन्तरित करने पर इसका विचारण प्रारम्भ हुआ।

सत्र वाद सं0 790/07 अपराध सं0 1240/06 धारा 205, 419 भा.द.सं. में थना सी0बी0गंज, बरेली द्वारा अभियुक्त सैयद मुबारिक के विरूद्ध आरोप-पत्र प्रस्तुत करने पर तथा दिनांक 9.8.07 को तत्कालीन न्यायिक दण्डाधिकारी तृतीय, बरेली द्वारा सत्र सुपुर्द करने पर तथा दिनांक 13.9.07 को तत्कालीन माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बरेली द्वारा इस न्यायालय में विधिपूर्ण निस्तारण हेतु अन्तरित करने पर इसका विचारण प्रारम्भ हुआ।

दिनांक 3.11.09 को मेरे द्वारा यह पाते हुए कि इन दोनों ही मामलों का विचारण मेरे पूर्वाधिकारी द्वारा एकीकृत कर प्रारम्भ किया जा रहा था परन्तु एकीकृत विचारण करने का स्पष्ट आदेश उनके द्वारा पारित नहीं किया गया। मेरे द्वारा दोनों ही पत्रावलियों को एकीकृत कर एकीकृत किया गया तथा लीडिंग पत्रावली के रूप में सत्र वाद सं0-242/07 विचारित की गई। इस प्रकार इन दोनों ही सत्र मामलों का विचारण मेरे पूर्वाधिकारी व मेरे द्वारा एकीकृत कर किया गया है।
संक्षिप्तः अभियोजन कथानक यह है कि दिनां 20.8.06 को समय 6ः30 बजे सायंकाल निरीक्षक स्थानीय अभिसूचना इकाई मय आर0के0 यादव के वास्ते करने संग्रह सूचना थाना सी0बी0गंज में मौजूद था कि सूचना प्राप्त हुई कि एक व्यक्ति जो अपने को काश्मीरी बताता है। आस-पास के मुस्लिम बाहुल्य ग्राम तिलियापुर बन्डिया व सनैयारानी आदि में घूम-घूमकर विद्वेष एवं घृणा फैलाने वाली बातें प्रचारित कर रहा है और अपने को काश्मीर का रहने वाला बताता है। इस समय यह व्यक्ति सनैयारानी ग्राम में मौजूद है। इस सूचना पर स्वयं वादी निरीक्षक मय हमराही ग्राम सनैयारानी पहुंचे तो वहां बाबू खां मेवाती के घर के बाहर खुली जगह में 15-20 व्यक्ति जमा थे। हम लोग भी उन्हीं में शामिल हो गय। उन व्यक्तियों में से एक व्यक्ति बुलन्द आवाज में कह रहा था कि भारतीय सेना ने भारतीय सरकार के इशारे पर मेरे गांव के 250 निर्दोष मुस्लिमों को खौफनाक ढंग से गोलियां बरसा कर आतंकवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया है। जिसमें मेरे माता, पिता, भाई, बहन, बीवी-बच्चे शहीद हो गये हैं। मैं किसी तरह से जान बचाकर भाग आया हूं। यह बात सुनकर मैं चुपचाप वापस बिना शक पैदा किये थाना सी0बी0गंज आया। थाना सी0बी0गंज से थानाध्यक्ष सत्यदेव सिंह सिद्धू व एस0आई0 मुन्ना सिंह व कां0 374 विनोद कुमार, व कां0 बिजेन्द्र कुमार मय जीप सरकारी कं थाने से रवाना होकर ग्राम सनैयारानी आया और उक्त व्यक्ति को बाबू खां के घर के पास समय करीब 6ः30 बजे सायं पकड़ लिया। नाम-पता पूछा और जमा तलाशी ली तो उसने अपना नाम सैयद मुबारिक पुत्र नवाब हुसैन निवासी चन्दनपुर महमूद तहसील रानीबाग, जिला पुन्छ काश्मीर बताया।

जमा तलाशी से उसके पास से पहने कपड़े एवं 100/- रूपये के अलावा अन्य कोई वस्तु बरामद नहीं हुई। उपरोक्त व्यक्ति को धारा 50 सी0आर0पी0सी0 के अनुपालन में कारण गिरफ्तारी बतायी गई कि तुम भारतीय सेना व भारतीय सरकार के विरूद्ध आप अपनी बातो से एक सम्प्रदाय में घृणा एवं विद्वेष की भावना फैला रहे थे। अतः उसको उसके जुर्म धारा 124(क) भा.दं.सं. से अवगत कराते हुए गिरफ्तार किया जाता है। मौके पर मौजूदा व्यक्तियों से गवाही देने को कहा गया तो मौके पर मौजूद अभियुक्त मुबारिक हुसैन की बातो से बहुत उत्तेजित एवं प्रभावित थे, गवाही देने से इन्कार कर दिया। फर्द मौके पर लिखी गई, पढ़कर सुनाकर हमराहीयान की गवाही बनवायी जाती है। गिरफ्तारी मेमो तैयार किया गया। अभियुक्त को गिरफ्तार किया गया व थाने पर लाकर मुकदमा दर्ज कर दिया।

विवेचक नियुक्त हुए। विवेचक द्वारा साक्षियों के साक्ष्य अंकित किये गये। घटना स्थल का नक्शा नजरी बनाया गया। दौरान विवेचना अभियुक्त द्वारा जम्मू काशमीर का पता बताये जाने पर तथा यह ज्ञात हाने पर कि अभियुक्त जनपद सीतार का निवासी है तथा उसके द्वारा बताये गये पतों की जांच की गई तो यह पाया गया कि यह गलत तरीके से जनपद काशमीर का पता पुलिस को बताया था। साक्षियों के साक्ष्य अंकित करने के पश्चात् अभियुक्त के विरूद्ध धारा 124(क) भा.दं.सं. तथा 205/419 भा.दं.सं. में पृथक-पृथक आरोप-पत्र प्रेषित किये गये।

अभियुक्त के विरूद्ध पृथक-पृथक आरोप-पत्रों के सम्बंध में पृथक-पृथक सत्र वाद दर्ज हुए तथा मेरे पूर्वाधिकारी द्वारा सत्र वाद सं0 242/07 में अभियुक्त के विरूद्ध धारा 124(क) भा.दं.सं. में दिनांक 9.10.07 को तथा सत्र वाद सं0 790/07 में दिनांक 9.10.07 को धारा 205,419 भा.द.सं. मंे पृथक-पृथक आरोप विरचित किये गये अभियुक्त ने पृथक-पृथक आरोपों से इन्कार किया तथा विचारण का दावा किया गया।

मेरे पूर्वाधिकारी द्वारा यद्यपि इन दोनों ही मामलों का विचारण एकीकृत कर किया था परन्तु इस सम्बन्ध में कोई आदेश पारित नहीं किया था तथा न्यायालय द्वारा दिनां 3.11.09 को यह पाते हुए एकीकृत करने का स्पष्ट आदेश पारित किया जो कि विचारण के प्रारम्भ से ही लागू होगा।

अभियोजन पक्ष द्वारा अपने कथानक को साबित करने के लिए 11 साक्षी परीक्षित कराये गये। पत्रावली से यह स्पष्ट होता है कि एकीकृत पत्रावली सत्र वाद सं0 790/07 मंे दिनांक 9.1.09 का भ्रमवश पी0डब्लु0-1 के रूप में एस0आई0 तेजीवीर सिंह को परीक्षित कराया गया। अतः ऐसी स्थिति में एस0आई0 तेजवीर सिंह को पी0डब्लु-1ए के रूप में मेरे द्वारा बाद में चिन्हित किया गया जिससे अभियोजन साक्षियों की संख्या में भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।

अभियोजन साक्षियों द्वारा मुख्य परीक्षा में जिन कथनों को न्यायालय के समक्ष किया है उनका संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रतिपरीक्षा में किये गये कथनों को दौरान विवेचना शामिल किया जायेगा।

पी0डब्लु0-1 साक्षी मुन्ना सिंह ने अपने मुख्य परीक्षा में शपथ पर संक्षिप्तः यह कथन किया कि दिनांक 20.8.06 को वह थाना सी0बी0गंज में बतौर उप निरीक्षक तैनात था। उस दिन निरीक्षक महेन्द्र सिंह व अन्य पुलिस कर्मियों के साथ एल0आई0यू0 के निरीक्षक आर0के0 यादव की सूचना पर मौके पर गया तथा वहां पर इकट्ठी भीड़ में वह शामिल हो गये। एक व्यक्ति बुलन्द आवाज में कह रहा था कि भारतीय सेना ने भारतीय सरकार के इशारे पर मेरे गांव के 250 निर्दोष मुस्लिमों को खौफनाक ढंग से गोलियां बरसाकर आतंकवादी बताकर मौत के घाट उतार दिया, जिसमें मेरे माता-पिता, बीवी-बच्चे, भाई, बहन शहीद हो गये है। मैं किसी तरह से जान बचाकर भाग आया हूं। ग्राम सनैया रानी में उक्त व्यक्ति को बाबू खां मेवाती के घर से दिनांक 20.8.06 को पकड़ लिया। पूछताछ करने पर उसने अपना नाम सैयद मुबारिक पुत्र नवाब हुसैन, निवासी चन्दनपुर महमूद तहसील रानीबाग, जिला पुन्छ काशमीर बताया। जमा तलाशी लेने पर उसके पहने कपड़े से 100/- रूपये बरामद हुए तथा भारत सरकार के विरूद्ध एक घृणा एवं विद्वेष की भावना पैदा करने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया तथा बरामदगी की फर्द बनाई गई तथा गवाहों को गवाही देने के लिए कहा गया तो गवाही देने से इन्कार किया गया। फर्द को प्रदर्शक-1 के रूप में साबित किया है।

पुनः यह भी कथन किया है कि अभियुक्त के पते की विवेचना की गई तो यह पता लगा कि उसका असली पता ग्राम अकवापुर थाना बिस्वां जनपद सीतापुर है तथा वह संदिग्ध प्रकृति का व्यक्ति है। उसका मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, जमीन का किसान बही प्राप्त की है। जांच उपरान्त यह पाते हुए कि उसके द्वारा गलत पता बताया गया उसके विरूद्ध धारा 205, 419 भा.द.सं. में आरोप-पत्र प्रेषित किया गया था।

पी0डब्लु0-2 द्वारा धारा 124(क) भा.द.सं. की चिक0एफ0आई0आर को प्रदर्शक-2 के रूप में व कायमी जी0डी0 को प्रदर्शक-3 के रूप में साबित किया है।

पी0डब्लु0-3 द्वारा पी0डब्लु0-1 के कथनों का समर्थन किया है तथा लगभग वही कथन किये गये हैं जो कि उनके द्वारा किये गये हैं।

पी0डब्लु0-4 द्वारा इस मामले की विवेचना करने का कथन किया गया है तथा निर्मित नक्शा नजरी का प्रदर्शक-4 के रूप में व धारा 124(क) भा.द.सं. के आरोप-पत्र को प्रदर्शक-5 के रूप में साबित किया है।

पी0डब्लु0-5 द्वारा पी0डब्लु0-1, पी0डब्लु0-2 द्वारा कथित कथनों का ही समर्थन किया है तथा उन्हीं के समान कथन न्यायालय के समक्ष किये हैं।

पी0डब्लु0-6 याकूब अली पक्ष द्रोही घोषित हुए हैं।

पी0डब्लु0-7 पक्ष द्रोही घोषित हुए हैे।

पी0डब्लु0-8 बाबू खां पक्ष द्रोही घोषित हुए हैं।

पी0डब्लु0-9 द्वारा इस मामले की विवेचना करने का कथन किया है तथा अभियुक्त के बताये गये पतों का तस्दीक करने का कथन किया है व साक्षियों के साक्ष्य अंकित किये व अभियुक्त के विरूद्ध धारा 205, 419 भा.द.सं. के मामले को पाते हुए दाखिल आरोप-पत्र को प्रदर्शक-6 के रूप में साबित किया है।

पी0डब्लु0-10 द्वारा अपने बयान में अभियुक्त सैयद मुबारिक द्वारा जनपद काशमीर को बताये पते की जांच हेतु जनपद काशमीर जाने का कथन किया है तथा यह भी कथन किया है कि उसका काशमी का पता गलत पाया गया था।

पी0डब्लु0-1ए उपनिरीक्षक तेजवीर सिंह द्वारा भी जनपद काशमीर के पते की जांच करने का कथन किया है तथा यह पाया है कि जनपद काश्मीर का पता उसके द्वारा गलत बताया गया है।

अभियोजन पक्ष द्वारा अन्य कोई साक्ष्य पेश न करने पर अभियोजन साक्ष्य समाप्त किया गया तथा अभियुक्त का बयान धारा 313 दं.प्र.सं. अंकित किया गया। अभियुक्त द्वारा धारा 313 दं.प्र.सं. के बयानों में साक्षियों द्वारा गलत बयान देने की बात कही। सफाई साक्ष्य देने से इन्कार किया।

बहस सुनी गई।

अभियुक्त पक्ष की ओर से संक्षिप्तः यह तर्क प्रस्तुत किये गये कि जहां पत्रावली पर आये साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष अभियुक्त की मौके पर उपस्थिति व उसके द्वारा किये गये कृत्य तथा उसकी गिरफ्तारी के तथ्यों का युक्ति युक्त संदेह से परे साबित करने में असफल हुआ है वहीं दूसरी ओर आरोपित अपराध अन्तर्गत धारा 124(क) भा.दं.सं. के सम्बंध में धारा 196 दं.प्र.सं. में आवश्यक अनुमति इस मामले में नहीं है तथा पत्रावली पर आये साक्ष्यों से जहां एक ओर धारा 205 व 419 भा.दं.सं. से सम्बन्धित अपराध भी अभियुक्त पर गठित नहीं होता हैं वहीं धारा 205 भा.दं.सं. हेतु निश्चित आवश्यकताएं अन्तर्गत धारा 195(1), (ख), (1) का अनुपालन इस मामले में नहीं किया गया अतः अभियुक्त पर आरोपित अपराध युक्ति युक्त संदेह से परे साबित नहीं है। अतः उसे दोष मुक्त किया जाये।

अभियोजन पक्ष द्वारा संक्षिप्तः यह तर्क प्रस्तुत किये गये कि उनके द्वाा 11 साक्षी इस मामले में परीक्षित कराये गये हैं जिनके साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त पर आरोपित अपराध युक्ति युक्त संदेह से परे साबित है। अभियुक्त का दोष सिद्ध किया जाये।

मैंने अभियुक्त पक्ष के विद्वान अधिवक्ता तथा अभियोजन पक्ष की ओर से अपर जिला शासकीय अधिवक्ता(फो0) को इस मामले के गुण दोषों पर प्रस्तुत किये गये तर्कों को पूर्ण रूपेण सुन लिया है तथा पत्रावली पर आये साक्ष्यों का सम्यक् परिशीलन कर लिया है।

पत्रावली के सूक्ष्म परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि संक्षिप्तः अभियोजन मामला यह है कि दिनांक 20.8.06 को अभियुक्त को भारतीय सेना ने भारतीय सरकार के विरूद्ध घृणात्मक उन्माद वाले वक्तव्य देते हुए गिरफ्तार किया गया था तथा गिरफ्तारी के पश्चात् उसके द्वारा बताया गया पता गलत पाया गया। इस प्रकार अभियुक्त पर धारा 124(क) भा.दं.सं. तथा धारा 205/419 ीाा.दं.सं. में पृथक-पृथक आरोप-पत्र प्रस्तुत किये गये।

मैंने सर्वप्रथम धारा 124(क) भा.दं.सं. के अपराध पर विचार किया।

धारा 124(क) भा.दं.सं. के अनुसार अभियोजन को निम्न तथ्यों को साबित करना आवश्यक हैः-

यह कि किसी व्यक्ति द्वारा,
1. भारत सरकार के प्रति घृणा या अपमान उत्पन्न किया हो या उत्पन्न करने का प्रयत्न किया हो या अपमान उत्पन्न किया हो या उत्पन्न करने का प्रयत्न किया हो या अप्रदीप्त करने का प्रयत्न किया हो।

2. ऐसे कार्य या प्रयास को
(क) बोले या लिखित शब्दों द्वारा या,
(ख) संकेतों द्वारा या,
(ग) दृश्य रूपेण द्वारा किया गया हो।

मैंने इस बिन्दु पर पत्रावली पर आये साक्ष्यों का सम्यक् रूपेण परिशीलन किया।

अभियुक्त द्वारा इस स्तर पर यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया है कि पुलिस कर्मियों की मौके पर उपस्थिति के सम्बंध में अभियोजन पक्ष युक्ति युक्त सर्वोत्तम साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है जिससे कि उनकी मौके पर उपस्थिति का तथ्य साबित नहीं होता है। मैंने इस बिन्दु पर विचार किया।

पी0डब्लु0-3, पी0डब्लु0-5 के रूप में परीक्षित निरीक्षक एल0आई0यू0 द्वारा यह कथन किया गया है कि दि0 20.8.06 को ज बवह गोपनीय सूचना एकत्र करने हेतु सी0बी0गंज क्षेत्र में घूम रहे थे तो मुखबिर की गोपनीय सूचना के आधार पर वे ग्राम सनैया रानी पहंुचे तो उन्हें बाबू खां के घर के सामने बाहर खुली जगह पर 15-20 आदमी जमा मिले जिसमें कि एक आदमी यह कह रहा था कि मैं जम्मू काशमीर का रहने वाला हूं। मेरे भाई, बहन, बच्चे, पत्नी व गांव के लगभग 250 व्यक्तियों को आतंकवादी बताकर भारतीय सेना ने भारतीय सरकार के इशारे पर मौत के घाट उतार दिया है। मैं किसी तरह जान बचाकर भाग आया हूं। मेरे बीवी-बच्चे सब उसमें शहीद हो गये हैं। पी0डब्लु0-3 व पी0डब्लु0-5 का यह भी कहना है कि यह सुनकर वह थाना सी0बी0 गंज आये तथा थानाध्यक्ष व अन्य पुलिस कर्मियों को बताकर उनको साथ ले कर मौके पर पुनः पहुंचे और तब तक वह व्यक्ति भाषण दे रहा था और ऐसे ही उसे गिरफ्तार किया गया।

चिक एफ0आई0आर प्रदर्शक-2 व कायमी जी0डी0 प्रदर्शक-3 जिसे कि पी0डब्लु-2 उपनिरीक्षक ओमकार सिंह जो कि तत्कालीन समय में हेड मोहर्रिर के द्वारा अपने लेख व हस्ताक्ष्र में होना साबित किया है, से यह स्पष्ट होता है कि लगभग 6ः30 बजे सायंकाल यह घटना होना कही गयी है तथा उसी दिन 9ः30 बजे यह प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करायी गई तथा घटना स्थल से थाने की दूरी लगभग 2 किमी0 थी। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि एल0आई0यू0 के दो पुलिसकर्मी पी0डब्लु0-3 व पी0डब्लु-5 द्वारा सर्वप्रथम अभियुक्त को 15-20 लोगों की भीड़ से ऐसी बातें करते सुना गया तथा फिर वह वहां से लगभग 2 किमी0 दूर थाने पर आये वहां पर थाने के पुलिस कर्मियों को सूचना दी और वह तब पुनः पुलिस कर्मियों के साथ मौके पर आये और उस व्यक्ति को वही बातें करते सुना तब उसको गिरफ्तार किया गया। निश्चित रूप से इन सब कायवाहियों में कम से कम एक-एक घंटे का समय अवश्य लगा होगा। पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि कितने बजे पी0डब्लु0-3 व पी0डब्लु0-5 एल0आई0यू0 के कर्मियों द्वारा अभियुक्त को यह बातें करते हुए सर्वप्रथम सुना गया था, वह समय उनके द्वारा साक्ष्य में कथित नहीं किया गया। अतः ऐसी स्थिति में लगभग एक घंटे तक 15-20 व्यक्तियों को लगातार वही बातें करते रहना व उसी स्थान पर एकत्र रहना तथा पुलिस कर्मियों के समक्ष भी इन्हीं बातों को इतने लम्बे समय तक किये जाते रहना स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता है। पत्रावली से यह भी स्पष्ट होता है कि थाना सी0बी0 गंज की कोई सम्बन्धित जी0डी0 जिसके द्वारा पुलिस कर्मी थाना सी0बी0 गंज थाने से निकले हो, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर साबि त नहीं की गई जब कि निश्चित रूप् से पुलिस कर्मी जब थाने से किसी कार्य हेतु निकलते हैं तब थाने में रखी जी0डी0 में इसका इन्द्राज निश्चायक रूप से किया जाता है तथा सम्बन्धित जी0डी0 ही एक मात्र साक्ष्य है जो यह दर्शित करती है कि प्रश्नगत समय पर पुलिस कर्मी किस उद्देश्य हेतु व कहां व कितने बजे व किस सूचना पर थाने से चले थे। अतः इस सम्बंध में यह एक सर्वोत्तम साक्ष्य है परन्तु अभियोजन पक्ष द्वारा सम्बन्धित रवानगी जी0डी0 को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर साबित नहीं किया है न ही इसे साबित न करने का क्या कारण था यह ही स्पष्ट किया। अतः ऐसी स्थिति में इस निष्कर्ष पर हूं कि अभियोजन पक्ष इस बिन्दु पर सर्वोत्तम साक्ष्य न्यायालय के समक्ष साबि त करन में पूर्णतः असफल रहा है परन्तु इतने मात्र से सम्पूर्ण अभियोजन कथानक को संदिग्ध नहीं माना जा सकता, बल्कि ऐसी स्थिति में न्यायालय पर यह दायित्व अधिरोपित होता है कि वह पत्रावली पर आये समस्त साक्ष्यों की सूक्ष्मता से विवेचना करे और तत्पश्चात् ही किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचे, जिस हेतु मैं अग्रसरित हूं।

पी0डब्लु0-1 व पी0डब्लु0-3 व पी0डब्लु0-5 जो कि मौके के साक्षी हैं, के साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि मौके पर ही अभियुक्त को गिरफ्तार किया गया था तथा उसकी गिरफ्तारी व बरामदगी की फर्द, जिसे कि प्रदर्शक-1 के रूप में साबित किया गया था, निर्मित की गई थी। इस साक्षियों के साक्ष्य व प्रदर्शक-1 को देखने से यह स्पष्ट होता है कि मौके पर उपस्थित व्यक्तियों द्वारा गवाही देने से इन्कार किया गया था परन्तु पत्रावली से यह स्पष्ट होता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा स्वतंत्र साक्षियों के रूप में पी0डब्लु0-6 याकूब अली, पी0डब्लु0-7 रसूल खां व पी0डब्लु0-8 बाबू खां तीन व्यक्तियों को न्यायालय के समक्ष परीक्षित कराया है। यह तीनों ही साक्षी पक्षद्रोही घोषित हुए हैं जिन्होंने अभियुक्त द्वारा कोई घृणात्मक वक्तव्य देने से इन्कार किया है तथा उनका यह कहना है, कि अभियुक्त को पुलिसकर्मियों द्वारा मस्जिद से पकड़ा गया था जहां कि वह मौजूद थे। इन साक्ष्यों के साक्ष्य से व नक्शा नजरी प्रदर्शक-4 जिसे कि पी0डब्लु0-4 विवेचक द्वारा साबित किया गया है, से यह स्पष्ट होता है कि मोटा बाबू खां के मकान के सामने अभियुक्त को घृणात्मक वक्तव्य देते हुए पुलिए कर्मियों द्वारा पकड़ा गया था अतः इस सम्बन्ध में सर्वोत्तम साक्षी मोटा बाबू खां थे परन्तु उन्हें नामि या परीक्षित क्यों नहीं किया गय इस सम्बन्ध में कोई कारण अभियोजन पक्ष स्पष्ट नहीं कर सका है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि केवल पी0डब्लु0-1, पी0डब्लु0-3, पी0डब्लु0-5 जो कि पुलिस कर्मी व एल0आई0यू0 के कर्मी हैं ही, इस सम्बंध में साक्षी है। पत्रावली से यह भी स्पष्ट होता है कि क्या अभियुक्त किसी राष्ट्र के विरूद्ध गतिविधियों में शामिल रहा था अथवा इस प्रकार की गतिविधियों से सम्बन्धित किसी गिरोह का सदस्य था इस सम्बंध में कोई भी साक्ष्य अभियोजन पक्ष द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर साबित नहीं किया गया। क्या अभियुक्त के संबंध में पूर्व में इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल होने की कोई सम्भावना थी कि इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल होने में वह कभी पाया गया था। अतः ऐसा कोई साक्ष्य अभियोजन पक्ष द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह भी स्प्ष्ट होता है कि अभियुक्त के वक्तव्य के संबंध में क्या कोई सत्यता थी इस संबंध में भी कोई जांच नहीं की गई थी तथा किस घटना के संबंध में वक्तव्य अभियुक्त दे रहा था उसमें क्या सत्यता थी। इस संबंध में कोई भी जांच नहीं की गई। पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि अभियुक्त के वक्तव्य से कौन व्यक्ति प्रभावित थे तथा किन व्यक्तियों के सामने वह ऐसे वक्तव्य दे रहा था तथा क्या ऐसे व्यक्ति उससे प्रभावित हुए थे। इस संबंध में कोई भी साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है और न ही ऐसे व्यक्तियों को नामित ही किया गया है जब कि 15-20 लोगों जिन्हें कहा गया है एकत्र होना कहा गया था निश्चित रूप से उस गांव के निवासी थे और पुलिसकर्मी उन्हें चिन्हित कर सकते थे परन्तु इन 15-20 व्यक्तियों को न तो नामित किया और न ही चिन्हित किया गया। अभियोजन पक्ष द्वारा जिन साक्षियों को इस संबंध में नामित व चिन्हित किया गया वह पी0डब्लु0-6, पी0डब्लु0-7 व पी0डब्लु0-8 के रूप में न्यायालय के समक्ष परीक्षित हुए हैं जिनके द्वारा अभियोजन कथानक का कोई समर्थन नहीं किया गया है। अतः ऐसी स्थिति में इस राय का हूं कि अभियुक्त द्वारा प्रश्नगत समय व दिनांक पर व प्रश्नगत स्थान पर ऐसा कोई वक्तव्य दिया गया अथवा अभियुक्त ऐसे वक्तव्य देने वाला कोई राष्ट्र विरोधी गिरोह का सदस्य था। इस संबंध में अपने कथनों की विश्वसनीयता अभियोजन पक्ष युक्ति युक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है।

अभियुक्त पक्ष द्वारा यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है िकइस मामले में धारा 124(क) भा.दं.सं. का संज्ञान लेने हुतु आवश्यक था कि धारा 196(क) दं.प्र.सं. के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी ली जाये और तत्पश्चात् ही न्यायालय ऐसे मामले पर संज्ञान ले सकता है जब कि प्रस्तुत मामले में कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई और न न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई। मैंने इस संबंध में विचार किया धारा 196(क) दं.प्र.सं. के अनुसारः-

(1) कोई न्यायालय -

(क) भारतीय दण्ड संहिता (1960 का 85) के अध्याय 6 के अधीन या धारा 153 (क), धारा 295 (क) या धारा 505 की उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का अथवा
(ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षडयन्त्र का अथवा
(ग) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 108(क) में यथा वर्णित किसी दुष्प्रेरण का, संज्ञान केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से ही किया जायेगा, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 6 में शामिल अपराधी के संबंध में न्यायालय संज्ञान उसी स्थिति में ले सकता है जब कि केन्द्रीय सरकार व राज्य सरकार की मंजूरी प्राप्त हो। पत्रावली से यह स्पष्ट होता है कि अभियोजन पक्ष द्वारा ऐसी कोई पूर्व मंजूरी केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से प्राप्त की गई, इस सम्बंध में उनके द्वारा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। इस संबंध में परीक्षित विवेचक पी0डब्लु0-4 जिनके द्वारा आरोप-पत्र दाखिल किया गया व आरोप-पत्र को प्रदर्शक-5 के रूप में साबित किया है, द्वारा कोई भी पूर्व मंजूरी इस संबंध में प्राप्त की गई ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है न ही अभियोजन पक्ष द्वारा ऐसी कोई पूर्व मंजूरी का प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया है।

अतः उपरोक्त स्थिति में मैं इस निष्कर्ष पर हूं कि धारा 124 (क) भा.द.सं. से संबंधित अपराध के संज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्रीय सरकार व राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी ली जाये और इसके बिना कोई भी न्यायालय इस अपराध में संज्ञान नहीं ले सकता। अतः ऐसी स्थिति में निश्चित रूप से संबंधित विवेचक द्वारा भारी भूल की गई है। उनके द्वारा ऐसी मंजूरी लेने का कोई प्रयासी भी किया गया ऐसा कोई साक्ष्य भी उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। अतः निश्चित रूप से मैं इस राय का हूं कि सम्बन्धित विवेचक द्वारा इस मामले में घोर अनियमितता बरती गई तथा धारा 196(1) दं.प्र.सं. के प्राविधानों के अनुसार धारा 124(क) भा.दं.सं. से संबंधित अपराध में न्यायालय द्वारा संज्ञान नहीं लिया जा सकता था। अतः उपरोक्त स्थिति में मैं इस निष्कर्ष पर हूं कि धारा 124(क) भा.दं.सं. का अपराध अभियुक्त पर, जहां एक ओर तथ्यों के संबंध में अभियोजन पक्ष युक्ति युक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है वहीं दूसरी ओर धारा 196(1) दं.प्र.सं. के अनुसार केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार से पूर्व मंजूरी न लिये जान पर अभियुक्त के विरूद्ध धारा 124(क) भा.द.सं. का अपराध चलने योग्य नहीं था। अतः अभियुक्त सैयद मुबारिक धारा 124(क) के अपराध से तद्नुसार दोष मुक्त होने का अधिकारी है।

अब मैंने धारा 205 व 419 भा.द.सं. के अपराध के संबंध में विचार किया।

धारा 205 भा.द.सं. के अनुसार-
जो कोई किसी दूसरे का मिथ्या प्रतिरूपण करेगा और ऐसे धरे हुए रूप में किसी वाद या आपराधिक अभियोजन में कोई स्वीकृति या कथन करेगा या दावे की संस्वीकृति करेगा, या कोई आदेशिक निकलवायेगा या जमानतदार या प्रतिभू बनेगा, या कोई भी अन्य कार्य करेगा, वह दोनों में किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष की हो सकेगी, या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।

अभियुक्त द्वारा इस स्तर पर यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि धारा 195 (क) बी, (1) दं.प्र.सं. के अन्तर्गत धारा 205 भा.दं.सं. से संबंधित मामले में संज्ञान ऐसे न्यायाल को या उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा जिस न्यायालय ने लिखित रूप से इस हेतु अधिकृत किया है, या किसी अन्य न्यायालय के, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ हों, लिखित परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं। अभियुक्त का यह तर्क है कि इस मामले में परिवादी न्यायालय नहीं है। अतः धारा 205 दं.प्र.ंसं. के अन्तर्गत यह मामला चलने योग्य नहीं है।

मैंने उक्त बिन्दु पर विचार किया तथा पत्रावली का सम्यक परिशीलन किया।

धारा 195 दं.प्र.सं. (1), (बी), (1) के जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) 196 तक (दोनों सहित), 199, 200, 205 से 211 तक (दोनों सहित) और 228 के अधीन दण्डनीय हो, जब ऐसे अपराध के लिए अभिकथित हो कि वह किसी न्यायालय में की कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया है।

इस प्रकार उक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट होता है कि जब धारा 205 भा.दं.सं. से संबंधित अपराध किसी न्यायालय की र्कावाही में या उसके संबंध में किया जाये तभी ऐसी स्थिति में न्यायालय अथवा न्यायालय के अधिकारी द्वारा लिखित रूप में परिवाद किया जाना आवश्यक होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धारा 205 भा.दं.सं. का अपराध न्यायालय के किसी कार्यवाही में अथवा उसके संबंध में किया गया है, के अलावा भी सम्पादित किया जा सकता है तथा ऐसे अपराध हेतु धारा 195 दं.प्र.सं. की विधिक आवश्यकता लागू नहीं होती।

मैंने उपरोक्त स्थिति में पत्रावली पर आये साक्ष्यों का सम्यक परिशीलन किया। पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अभियुक्त के गिरफ्तार हो जाने के पश्चात् पुलिस कर्मी जो कि लोक सेवक था, के समक्ष अभियुक्त द्वारा अपना गलत पता बताया गया यह अभियोग अथ्भयुक्त पर है पुलिसकर्मी जो लोक सेवक है उनके समक्ष गिरफ्तारी के पश्चात की गई इस कार्यवाही में अभियुक्त द्वारा किये गये कथन न्यायिक कार्यवाही में किये गये कथन नहीं माने जायेंगे। अतः धारा 195 (1), (बी), (1) दं.प्र.सं. की विधिक आवश्यकता इस मामले में नहीं थी। अतः ऐसी स्थिति में मैं इस राय का हूं कि अभियुक्त का यह तर्क विधितः स्वीकार नहीं किया जा सकता।

धारा 205 भा.दं.सं. के सम्यक् परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि इस अपराध को गठित करने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक तत्व है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे का मिथ्या प्रतिरूपण करे और ऐसे धरे हुए रूप में ऐसा अपराध कारित करे। मिथ्या प्रतिरूपण का अर्थ क्या है, इस संबंध में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 416 से परिभाषित करता है।
धारा 416 भा.दं.सं. के अनसार-

कोई व्यक्ति प्रतिरूपण द्वारा छल करता है, यह तब कहा जाता है ज बवह यह उपदेश करके कि यह कोई अन्य व्यक्ति है, या एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के रूप में जानते हुए प्रस्थापित करके, या यह व्ययदिष्ट करके कि वह या कोई अन्य व्यक्ति, कोई ऐसा व्यक्ति है, जो वस्तुतः उससे या अन्य व्यक्ति से भिन्न है, छल करता है।

स्पष्टीकरण - यह अपराध हो जाता है चाहे वह व्यक्ति जिसका प्रतिरूपण किया गया है वास्तविक व्यक्ति हो या काल्पनिक।

इस प्रकार धारा 416 भा.दं.सं. से यह स्पष्ट होता है कि मिथ्या प्रतिरूपण किये जाने हेतु दो व्यक्तियों की आवश्यकता है प्रथम वह व्यक्ति जिसके द्वारा मिथ्या प्रतिरूपण किया गया हो द्वितीय वह व्यक्ति जिसके नाम का पद व हैसियत का मिथ्या प्रतिरूपण अभियुक्त द्वारा किया गया हो। उपरोक्त स्थिति को प्रस्तुत मामले के परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त द्वारा अ पने को कोई अन्य व्यक्ति नहीं बताया गया, बल्कि उसके द्वारा मात्र स्वयं का पता जम्मू काशमीर का बताया गया। यह अभियोग अभियुक्त पर है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त द्वारा मात्र अपने का जम्मू काश्मीर का निवासी होना बताया था। वहां के किसी अन्य व्यक्ति के नाम के रूप में वहैसियत के रूप में अपने को प्रदर्शित नहीं किया। इस प्रकार मात्र अभियुक्त के विरूद्ध यह आरोप है कि उसके द्वारा लोक सेवक को गलत पता बताया गया तथा पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट है कि अभियुक्त कोई अन्य व्यक्ति था इस संबंध में न तो कोई साक्ष्य है और न ही विवेचक इस तथ्य से प्रभावित रहे हो। न ही अभियुक्त द्वारा ऐसे किसी अन्य व्यक्ति के पद व हैसियत धारण कर कोई लाभ लेने की ही कोई चेष्टा की है। अतः ऐसी स्थिति में मैं इस राय का हूं कि अभियुक्त द्वारा किसी अन्य व्यक्ति का मिथ्या प्रतिरूपण कर उसकी पद व हैसियत व नाम धारण करने की कोई कोशिश नहीं की थी। अतः प्रस्तुत मामले मं यह नहीं माना जा सकता कि अभियुक्त द्वारा किसी अन्य व्यक्ति का नाम, पद अथवा हैसियत का मिथ्या प्रतिरूपण किया हो।

धारा 205 भा.दं.सं. के परिश्ज्ञीलन से यह स्पष्ट होता है कि ऐसे मिथ्या प्रतिरूप्ण या धरे हुए रूप में किसी वाद या आपराधिक अभियोजन ने भी स्वीकृति या कथन अभियुक्त करे अथवा दावे की संस्वीकृति करे अथवा कोई आदेशिका निकलवाये या जमानतदार या प्रतिभू बने व कोई अन्य कार्य करे उसी स्थिति में धारा 205 भा.दं.सं. का अपराध गठित होगा। पत्रावली पर अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अभियुक्त द्वारा ऐसा कोई कार्य नहीं किया गया, बल्कि केवल उसके द्वारा लोक सेवक के समक्ष गिरफ्तारी के समय अपना पता गलत बताया, यह कथन किया गया। उक्त समय न तो कोई वाद लम्बित था और न ही कोई आपराधिक अभियोजन चल रहा था।

पत्रावली पर आये साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि अभियोजन पक्ष का मात्र यह कथन है कि अभियुक्त द्वारा गिरफ्तारी के पश्चात ही अपना पता गलत बताया है। इस संबंध में क्या उसके बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष रिकार्ड किये गये। इस संबन्ध में कोई भी साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है तथा क्या जांच उसके पते को जानने हेतु की गई इस संबंध में परीक्षित साक्षी पी0डब्लु0-10 व पी0डब्लु0-1ए के साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि दिनांक 26.6.07 को कुछ काशमीर की पते की सत्यता को जानने के लिए गये थे। किसके आदेश से व किस विधिक प्रक्रिया के अन्तर्गत वह ऐसी जांच करने गये थे तथा इस संबंध में कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है। जांच के दौरान उनके द्वारा किन व्यक्तियों से पूछताछ की गई इस संबंध में कोई भी साक्ष्य अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। पी0डब्लु0-10 का मात्र यह कहना है कि वह पुलिस अधीक्षक महोदय पुंछ कार्यालय में गया, वहां इस संबंध में जानकारी की। अपने साक्ष्य में पी0डब्लु0-10 प्रभारी महोदय से लिखित प्रमाण-पत्र भी इस संबंध में प्राप्त करने का कथन करते हैं कि ग्राम चन्दनपुर व तहसील रानीबाग, जिला पुंछ के नाम का कोई स्थान नहीं है परन्तु उक्त प्रमाण-पत्र कहां है, उसे क्यों न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। इस संबंध में अभियोजन पक्ष मौन है तथा ऐसा कोई लिखित प्रमाण-पत्र न्यायालय के समक्ष अभियोजन पक्ष द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। पी0डब्लु0-1ए के रूप में परीक्षित उपनिरीक्षक तेजवीर सिंह द्वारा अभियुक्त सैयद मुबारिग को जिला पुंछ काशमीर के पते की जांच करने हेतु जाने का कथन भी किया है तथा इस संबंध में उन्हें एक प्रमाण-पत्र भी बनाकर जिला पुंछ की पुलिस ने दिया था कि बताये गये पते का कोई स्थान वहां नहीं है। यह कथन किया है परन्तु इनके द्वारा ऐसा कोई प्रमाण-पत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया है तथा वह प्रमाण-पत्र कहां है व प्रस्तुत न करने का कारण क्या है इस संबंध में कोई भी साक्ष्य उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया है तथा किसके आदेश से किस प्रकार वह जिला पंुछ काशमीर गये थे इस संबंध में कोई भी दस्तावेजीय साक्ष्य उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। अतः ऐसी स्थिति में मैं इस राय का हूं कि जिला पुंछ का पता, जिसके संबंध में अभियोजजन का यह कथन है कि उसे अभियुक्त ने बताया था कि किस प्रकार जांच में फर्जी पाया गया इस तथ्य के संबंध में सर्वोत्तम साक्ष्य न्यायालय के समक्ष अभियोजन जानबूझ कर प्रस्तुत करने में विफल रहा है। इस प्रकार जहां एक ओर अभियुक्त द्वारा पुलिस कार्यवाही के दौरान जिला पुंछ का पता बताया गया यह कथन मात्र पुलिस के समक्ष किया गया कथन है, जो कि विधि अनुसार साक्ष्य में ग्राह्य नहीं है, वहीं दूसरी ओर जिला पुंछ के पते की सत्यता जानने के लिए वास्तविक प्रयास किया गया। इस संबंध में कोई भी सर्वोत्तम साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नहीं है।

पत्रावली से यह भी स्पष्ट होता है कि साक्ष्यों ने यह स्वीकार किया है कि जमानत प्रपत्र पर अपना पता जनपद सीतापुर का बताया था तथा उक्त पता सत्य पाया गया। अतः उक्त स्थिति में मैं इस राय का हूं कि जहां अभियोजन पक्ष अभियुक्त के विरूद्ध गलत पता बताये जाने के तथ्य को व उस संबंध में की गई जांच को न्यायालय के समक्ष युक्ति युक्त संदेह से परे साबित करने में पूर्णतः असफल रहा है वहीं दूसरी ओर जमानत के प्रथम स्तर पर लिखित रूप में जो पता अभियुक्त द्वारा बताया गया वह सत्य पाया गया था। पत्रावली से यह भी स्पष्ट है कि अभियुक्त के विरूद्ध धारा 419 का आरोप भी लगाया गया है तथा ऊपर की गई विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के नाम, पद अथवा हैसियत का मिथ्या प्रतिरूपण किया गय यह तथ्य साबित नहीं है तथा धाा 419 भा.दं.सं. मिथ्या प्रतिरूपण द्वारा छल किये जाने के अपराध को दण्डनीय करती है। अतः ऐसी स्थिति में अभियुक्त द्वारा कोई छल किया गया यह भी अभियोजन पक्ष द्वारा साबित किया जाना आवश्यक है। छल को धारा 415 भा.दं.सं. में परिभाषित किया गया है। जिसके अनुसार -

छल - जो कोई किसी व्यक्ति से प्रवंचना कर उस व्यक्ति को, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया है कपटपूर्ण बेईमानी से उत्प्रेरित करता है िकवह कोई सम्पत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे, या यह सम्मति दे दे कि कोई व्यक्ति किसी सम्पत्ति को रखे या साशय उसे व्यक्ति को जिसे इस प्रका प्रवंचित किया गया है, उत्पे्ररित करता है िकवह ऐसा कोई कार्य करे, या करने का लोप करे जिस वह उसे इस प्रकार प्रवंचित न किया गया होता तो, न करता या करने का लोप न करता और जिस कार्य का लोप उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक ख्याति संबंधी या सामपत्तिक नुकसान या अपहानि कारत होती है, या कारित होनी संभाव्य है, वह ‘‘छल’’ करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण - तथ्यों का बेईमानी से छिपाना इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत प्रवंचना है।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि छल के अपराध में साबित किया जाना आवश्यक है कि कपटपूर्वक बेईमानी से अभियुक्त ने किसी व्यक्ति को उत्प्रेरित किया हो कि वह किसी व्यक्ति की सम्पत्ति उसे प्रदत्त कर दें अथवा यह सहमति दे दे कि कोई व्यकित किसी सम्पत्ति को रखे। प्रस्तुत मामले के परिश्ज्ञलीन से उपरोक्त अपराध को देखने से यह स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत मामले में ऐसा कोई तथ्य अभियोजन पक्ष द्वारा नहीं किया गया है कि अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति अथवा अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति को इस प्रकार प्राप्त करने या अपने कब्जे में बनाये रखने का प्रयास को हो।

इस प्रकार उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि जहां एक ओर धारा 205 भा.दं.सं. का आरोप भाी अभियोजन पक्ष युक्ति युक्त संदेह से परे अभियुक्त पर साबित करने में पूर्णतः असफल रहा है वहीं अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों से अभियुक्त पर धारा 419 भा.दं.सं. के अपराध का आरोप भी गठित नहीं होता है।

इस प्रकार उपरोक्त विवेचना के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर हूं कि अभियुक्त सैयद मुबारिक धारा 124 (क), 205 व 419 भा.दं.सं. के अपराध से दोषमुक्त होने का अधिकारी है।
आदेश

अभियुक्त सैयद मुबारिक को धारा 124 (क) भा.दं.सं. व धारा 205/419 भा.दं.सं. के अपराध से दोषमुक्त किया जाता है।

अभियुक्त सैयद मुबारिक जमानत पर है। न्यायालय में उपस्थित है। उसके बन्ध-पत्र निरस्त। प्रतिभू उन्मोचित किये जाते हैं।



दिनांकः 02.12.09 (विनय खरे)
अपर सत्र न्यायाधीश (त्वरित न्यायालय)
कक्ष सं0-3, बरेली


निर्णय व आदेश आज मेरे द्वारा हस्ताक्षरित, दिनांकित करके खुले न्यायालय में सुनाया गया।


दिनांकः 02.12.09 (विनय खरे)
अपर सत्र न्यायाधीश (त्वरित न्यायालय)
कक्ष सं0-3, बरेली





अब हैं हमारे जनप्रतिनिधि महान
जो करते हैं राजनीति जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की।
पर लागू नहीं होता कोई कानून,
न लगता है NSA, न लगता है मकोका।
आखिर जनता और रियाया है इन्ही के खिलवाड़ की चीज।
क्यूं नही लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
न्हीं लगवायेंगे! क्योंकि हमाम में सब हैं नंगे।
क्या राष्ट्रीय! क्या क्षेत्रीय!
इन्होंने ही तो पाला था भस्मासुर पंजाब का,
जिसने मरवाये, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अनेक,
जिनकी तादात हजारों में नहीं लाखों में थी।
यही हाल कश्मीर, आसाम, मणिपुर का अभी भी है।
मरे जा रहे हैं रोज अनेक, कभी गोलियों से, कभी बारूद के धमाकों से,
उड़ते हैं चीथड़े, खून के लोथड़े, इंसानी अंगों के और इंसानियत के भी।
मरते हैं रोज वर्दी वाले या बिना वर्दी के,
हैं तो सब ही भारत मां के सपूत।
फिर ऐसा क्यूं होता है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
आखिर क्यूं चलवाते हैं,
प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली?
आखिर क्यों करवाते हैं,
फर्जी एन्काउन्टरों में सतत् हत्यायें?
आखिर क्यूं छीनते हैं,
जीवित रहने का नैसर्गिक संवैधानिक अधिकार?
कानून व्यवस्था के बहाने, फर्जी क्राइम रिकार्ड के नाम
सिर्फ और सिर्फ फर्जी आंकड़ेबाजी के लिए,
जनता को ही बेवकूफ बना झूठी वाहवाही के लिए।
जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाने के लिए,
छोड़ते रहते हैं शिगूफों पर शिगूफे, ताकि आये ही न ध्यान,
रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और महंगाई का।
हमारे ही प्रतिनिधि, मुखिया सरकार के,
चलवाते हैं बाकायदा अभियान,
भरते हैं जेलें गरीब गुरबा जनता से,
फर्जी मुकदमें तो है बपौती, पुलिस और प्रशासन की।
क्या इस अमानवीयता के बिना कानून व्यवस्था रह जाएगी अधूरी।
खड़ा है इस भ्रष्टाचार की नींव पर,
घूस के रूपयों का बहुत बड़ा साम्राज्य।
दबी जा रही है अदालतें ढाई करोड़ मुकदमों के बोझ से,
बेगुनाह साबित होने में लग जाते हैं चार-छः साल।
फिर भी छीना ही जाता रहता है जनता का,
सामान्य जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार
होती रहेंगी सतत् हत्यायें मानवता की फर्जी एन्काउन्टरों में।
क्यूं बढ़ावा देते रहते हैं झूठी बहादुरी को?
तमगे और आउट आॅफ टर्न प्रमोशन देकर।
आखिर क्यूं करवाते रहते हैं सतत्,
संविधान की हत्या?
जबकि संविधान से ही पाते हैं,
ताकत और शासन का अधिकार।
फिर क्यूं रख देते हैं संविधान को,
सजाकर सिर्फ अलमारी में?
जहन से निकाल ही क्यूं देते हैं,
संविधान और जनता को?
फिर भी देते फिरते हैं संविधान की दुहाई।
जनता को सिर्फ बेवकूफ बनाने की खातिर।
जबकि खुद ही नहीं करते संविधान का पालन,
करते हैं राजनीति - जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और हत्या की।
आखिर ऐसा क्यूं है?
वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा।
बागी भी तो हैं इंसान और भारत मां के ही सपूत।
पर उनके मन में है एक आग,
उस आग को ही क्यूं ठंडा नहीं करते?
पानी क्यूं नहीं डालते उस पर?
इंसान क्यूं मारते हैं?
क्यूं बनाते हैं, नीति दमनकारी?
आखिर जानबूझकर क्यूं करते हैं नीतिगत गलती?
वह आग पैदा तो आप ही करते हैं,
आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार की विष बेल पर।
आखिर क्यूं पिला रहे हैं दूध आस्तीन के सांपों को?
क्या राज्य की कुर्सी राष्ट्र से ज्यादा जरूरी है?
एक राज्य में कुर्सी न मिले तो क्या कम रह जाता रूतबा राष्ट्र में?
इंदिरा का बलिदान क्या कम है समझने के लिए?
क्यूं नहीं करते स्वच्छ पारदर्शी राजनीति?
क्या तब पेट न भरेगा या रोटी पड़ जाएगी कम?
जिन्ना ने मरवाया था बीस लाख, ठाकरे और राज मरवायेंगे करोड़ों।
जिन्ना ने करवाया था देश के दो टुकड़े, प्रान्त में छिपे जिन्ना करवायेंगे अनेक।
फिर क्यूं नहीं लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर?
नजर बन्द करें इन भस्मासुरों को या डालें काल कोठरियों में।
इन्हें पूरी तरह काट दें समाज और देश दुनिया से।
संेसर काटें इनकी जहरीली वाणी का,
नहीं घुलेगा जहर समाज में नहीं लगेगी आग।
अभियान7 चलाना है तो चलाएं इनके ही खिलाफ,
और शासन तन्त्र में आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार के ही खिलाफ।
जो है राष्ट्रद्रोह से भी बढ़कर राष्ट्र के जन-जन के प्रति अपराध,
यही है असली अपराधी समाज के।
ताज में कसाब से निपटाया ब्लैक कैट
बार्डर के दुश्मनों से तो निपट सकते हैं तोप और बुलेट से पर,
आस्तीन के सापों से निपटेंगे कैसे?
माहिर पुलिस रोज करती है फर्जी मुठभेड़ मरते हैं अनेक
क्या है कोई व्यवस्था देश में?
जो इन भस्मासुरों से करे वास्तविक मुठभेड़।
क्यूं बढ़ने और पकने ही दें ऐसे फोड़ों को?
जो बन जाएं नासूर रिसने लगे मवाद और खून।
शुरू में ही क्यूं नहीं नश्तर से देते चीर,
ऐसे गम्भीरतम मामलों में?
कहां खो गयी है विशेषता राष्ट्र की?
कुछ बताएंगे विधि-विशेषज्ञ,
कुछ करेंगे, हमारे विद्वान न्यायाधीश।
इतने बड़े देश में एक अरब की आबादी में।
जूझ रहा है निहत्था सिर्फ एक खिलाड़ी महान।
क्या है कोई ‘‘जांबाज मानुस’’ जो करे मुठभेड़,
अन्त करे इन भस्मासुरों का आस्तीन के सांपों का।।

- महेन्द्र द्विवेदी

यह लोकतंत्र है मजबूत और सुदृढ़ लोकतंत्र। इसको और सुदृढ़ बनाने के लिए वोट का हथियार उठाना बहुत जरूरी है। हम आये दिन रोते हैं रोना अपनी गरीबी का, अपनी कमजोरी का, साधन विहीनता का, बेरोजगारी का, जमाखोरी का, महंगाई का, गुंडागर्दी का, गुंडाराज का, माफिया राज का, चोरी-डकैती का, घूसखोरी का, सरकारी कामों में कमीशन का और लूट का - कहां तक गिनाऊं, गिनाना आसान नहीं है।
कुछ ने कहा दाल में काला है, कुछ ने कहा पूरी दाल काली है। सच है जिसने जो भी कहा पर इसका इलाज, शायद लाइलाज है यह मर्ज। अभी चन्द दिनों पहले बात हो रही थी एक अधिकारी से जो मुझसे बोले एक मामले जनहित याचिका करने के लिए, मैंने कहा अगर वो याचिका मैं करता हूं तो वह जनहित याचिका न होकर मेरी स्वहित याचिका बनकर रह जायेगी क्योंकि उसमें लोग मुझे हितबद्ध व्यक्ति समझकर निशाना मुझ पर साधेगें इसलिए मैंने इसके लिए नाम सुझाया सामाजिक हितों को रखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता का। जाने-माने कार्यकर्ता हैं वो नाम लेते ही बोले- अच्छा आप संदीप पाण्डे को बता रहे हैं, जो सभी अधिकारियों को भ्रष्ट बताते हैं। भ्रष्टाचार हम करते नहीं बल्कि वह तो हमारी मजबूरी है। हम अपने वेतन में कैसे चला पायेंगे अपनी जिंदगी, गिनाना शुरू किया हर चीज की महंगाई का। मैंने उनको समर्थन देते हुए कहा-हम देश के लगभग सब लोग बेईमान हैं। अपने को बेईमान बताते हुए उन्होंने खुशी से मुझे बेईमान होना मान लिया। मैंने बात फिर आगे बढ़ाई, हां, हम सब बेईमान हैं लेकिन ईमानदार है वह व्यक्ति जिसको बेईमानी का मौका नहीं मिलता। वह बोले आपने तो मेरी बात कह दी, लेकिन मैंने उनकी बात में एक बात और जोड़ी, लेकिन यह तो सिद्धान्त है और हर सिद्धान्त का अपवाद भी होता है अगर कोई ईमानदार है तो अपवाद स्वरूप।

लगता है मैं बहक गया अपनी बात कहते-कहते विषय से हट गया, विषय तो सिर्फ इस वक्त है-लोकतंत्र में वोट की चोट का। हमने तो लोकतंत्र को भी राजशाही में बदल रखा है। राजा का बेटा राजा, उसका बेटा राजकुमार, आगे चलकर राजा। आजकल मीडिया ने एक राजकुमार को बहुत ही बढ़ा रखा है, खबरों में चढ़ा रखा है। कभी खबर आती है-राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया, कभी खबर आयी-राजकुमार ने दलित के घर में रात बितायी। राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया दस रूपये का, दलित के घर तक पहुंचने का खर्च आया, लाख में, दलित के घर तक चलकर सोने में खर्च आया, लाखों का और कुल मिलाकर राजकुमार पर प्रतिदिन खर्च आता है लगभग करोड़ का। फिर छोटे राजकुंवर पीछे क्यों रहें उन्होंने भी सिर उठाया, साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया, साम्प्रदायिकता की सीढ़ी पर चढ़कर आकाश छूने का प्रयास किया, वो अलग बात है धराशायी रहे। इस लोकतंत्र ने बहुत सारे छोटे-छोटे राजा पैदा किये हैं जिनके अपने-अपने राज हैं, अपना-अपना ताल्लुका है और अपने दरबारी हैं। गोण्डा के गजेटियर में पढ़ा है कि अली खान के बेटे शेखान खान ने अपने बाप को मारकर उनका सिर मुगल दरबार में पेश किया जो अजमेर गेट पर लटकाया गया और मुगल शासक ने शेखान खान को खुश होकर खान-ए-आजम मसनत अली का खिताब देकर उसे जमींदारी का अधिकार दिया। यही हाल आज के लोकतांत्रिक राजशाही में है-भाई-भाई से लड़ता है, बाप-बेटे से लड़ता है, चाचा-भतीजे से लड़ता है, भतीजा-चाचा से लड़ता है। कोटा और परमिट तक के लिए हम नेताओं की चापलूसी करते हैं, उस चापलूसी में चाहे हमें उनका हथियार ही क्यों न बनना पड़े और हमें हथियार बनाकर लोकतंत्र के ये राजा आगे बढ़ते हैं और वंशवाद फल-फूल रहा है और हम चाटुकारिता करके ही अपने को बहुत बड़ा आदमी मान बैठते हैं। कभी कहते हैं भइया ने मुझे पहचान लिया, नेता जी ने मुझे नाम लेकर बुलाया, देखो कितनी अच्छी याददाश्त है, मंत्री जी ने सभा मेरे नाम का ऐलान किया बहुत मानते हैं मुझे, कहां जाते हैं किसी के घर नेताजी हमारे घर आये थे, सिक्योरिटी के साथ चलते हैं, बहुत बड़े आदमी हैं, देखो सिक्योरिटी छोड़कर और उसे चकमा देकर मेरे घर पहुंच गये, लेकिन यह नहीं सोचा सिक्योरिटी किससे हम जिसके प्रतिनिधि हैं उसके डर से सिक्योरिटी या फिर जिसके प्रतिनिधि हैं उसको डराने के लिए सिक्योरिटी, जितनी बड़ी फोर्स चलेगी जिसके साथ, उतना ही बड़ा स्टेटस माना जाएगा उसका, यह मान्यता दे रखी है हमारे समाज ने।

इन मान्यताओं को समाप्त करना होगा, लोकतंत्र में रहकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए लोकतंत्र में भागीदार बनना बहुत जरूरी है, अगर हम हर काम में यही सोचेगें कि लोकतंत्र सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, लोकतंत्र में कामयाबी बेईमानों की है, भ्रष्ट लोगों की है, झूठों और धोखेबाजों की है, बेईमानों और दगाबाजांे की है तो हम अपने साथ छल करते रहेगें इसलिए आवश्यक है इन मान्यताओं पर उठाराघात करने की।

आइए, समझिए-समझाइए, मिलिये-मिलाइये लोकतंत्र में वोट की कीमत का सही इस्तेमाल कीजिए और देश की पूंजी पर कुण्डली मारकर बैठे लोगों को शिकस्त देने के लिए, देश की सम्पत्ति को लूटने वालों के लिए एक हो जाइये, मिलकर लड़इये ओर लोकतंत्र के हत्यारों को राजा बनने से देश को बचाने के लिए वोट का चोट दीजिए।

मुहम्मद शुऐब
एडवोकेट

कृषक और मजदूर हमारे तरसें दाने-दाने को,

दिनभर खून जलाते हैं वो, रोटी, वस्त्र कमाने को,

फिर भी भूखों रहते बेचारे, अधनंगे से फिरते हैं,

भूपति और पूंजीपतियों की कठिन यातना सहते हैं,

भत्ता-वेतन सांसद और मंत्रियों के बढ़ते जाते हैं,

हम निर्धन के बालक भूखे ही सो जाते हैं।


शव निकल रहा हो और शहनाइयां बजें।

दुखियों की हड्डियों से यहां कोठियां सजें।।


-मुहम्मद शुऐब एडवोकेट

16 नवम्बर 2009 की बात है। मैं अपने कमरे में पहुंचा, देखा सहारा न्यूज पर रात के 9ः38 बजे दिखाया जा रहा था कि 6 शेरों का एक झुंड भैंस के बच्चे पर टूट पड़ा, पास में नदी थी, जो उस नदी में जा गिरा। नदी में मगर, जिसके बारे में मुहावरा है-नदी में रहकर मगर बैर, वही मगर था जो अपना शिकार देख आगे बढ़ा और जबड़े में दबोच लिया। एक तरफ से शेर भैंस के उस बच्चे को पकड़कर खींच रहे थे, दूसरी तरफ जल का राजा मगर अपने शिकार को अपनी तरफ खींच रहा था। आखिर में हार मगर के हाथ लगा और शिकार झुंड के हाथ यानि शेर नहीं शेरों के हाथ।

दूर पर भैंसों का एक झुंड जो काफी बड़ा था बेबस व लाचार अपने बच्चे को निहार रहा था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह बच्चे को बचाये। बच्चा शेर का मुह का निवाला बनता इससे पहले एक भैंसा हिम्मत कर बैठा और बच्चे को छुड़ाने के लिए शेरों के झुंड पर टूट पड़ा। अकेले भैंसे आगे बढ़ता देख पहले तो कुछ डरी सहमी भैंसें भी आगे बढ़ीं फिर एक-एक कर सारी भैंसें शेरों के झुंड पर टूट पड़ीं। फिर क्या था, पहल करने वाले भैंसे की हिम्मत बढ़ी और उसने एक-एक कर शेरों को अपनी सींग पर एक-एक करके शेरों को उछालता रहा और शेर दुम दबाकर भागते रहे। हिम्मत न हुई किसी एक शेर की भी कि वह लौटकर भैंसे पर झुंड की किसी भैंस पर या फिर अपने शिकार पर पलटकर हमला करता।
देखा तो बहुतों ने होगा, इस दृश्य को टी0वी0 पर। कोई देखकर हंसता रहा होगा और हंसते हुए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया, किसी ने देखा होगा और यह समझा होगा कि यह जंगली जानवरों का खेल है, कोई बुद्धिमान होगा उसने सोचा होगा यही जंगल का कानून है, किसी ने सोचा होगा एकता में बल है। सचमुच एकता में बल है पर उससे आगे एक सोच और विकसित करनी होगी, एकता बनाने के लिए किसी को तो आगे बढ़ना होगा, किसी को तो अपनी जान जोखिम में डालनी होगी और सम्भव है कि अपनी कुर्बानी देनी होगी। जी हां, कुर्बानी! कुर्बानी और वह भी अपनी जान की। अगर आप एकता बनाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं तो एकता बनेगी और जरूर बनेगी और भैंसों की तरह हम कमजोर ही सही सब कमजोर मिलकर एक बड़ी ताकत बनेंगे और अपने बीच के कमजोर से कमजोर को बचाने में उसी तरह से कामयाब होंगे जिस तरह कमजोर भैंसें कामयाब हुईं, अपने कमजोर बच्चे को बचाने में।
कमजोरों, मज़लूमों, दलित, प्रताड़ित, भूख सताये हुओं, धनलोलुपों के शिकार बने, सरकारी तंत्र में पीछे जाने वाले लोगों जागो, उठो और एक होकर अपने अधिकारों को पाने की लड़ाई लड़ों, विजय तुम्हारी होगी और हम होंगें कामयाब एक दिन।

मुहम्मद शुऐब
एडवोकेट

'शान्ति के लिए युद्ध' के नारे के साथ अमेरीकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने दुनिया का बहुचर्चित नोबेल शान्ति पुरस्कार प्राप्त कियाव्हाईट हाउस के प्रवक्ता रोबेर्ट गिब्स ने बताया कि "श्री ओबामा युद्ध के नायक के रूप में नोबेल शान्ति पुरस्कार प्राप्त किया है" । नोबेल शान्ति पुरस्कार ने साम्राज्यवादी देशों के मुखिया को शान्ति पुरस्कार देकर नोबेल समिति ने अपने को भी सम्मानित किया है और अपना नकली मुखौटा उतार दिया है । आने वाले दिनों में नोबेल शान्ति पुरस्कार यमराज को भी दिया जा सकता है और इस पर किसी को आश्चर्य नही होना चाहिएअफगानिस्तान में शान्ति के लिए 30 हजार सैनिक भेजे जा रहे हैंईराक में भी प्रतिदिन उनके शोषण के ख़िलाफ़ युद्ध जारी हैपकिस्तान में ओबामा के तालिबानी लड़ाके पाकिस्तानी सरकार शान्ति का पाठ अपने नागरिको को पढ़ा रही हैशान्ति का अर्थ अमेरिकन साम्राज्यवादियों उसकी पिट्ठू मीडिया ने बदल दिया है
संयुक्त राष्ट्र संघ साम्राज्यवादियों के हितों की पूर्ति के लिए विश्व संगठन है उसी तरह नोबेल पुरस्कार समिति साम्राज्यवादियों के हितों की रक्षा के लिए लोगों को सम्मानित पुरस्कृत किया करती हैनोबेल पुरस्कार अधिकांश विवादित होते हैं और साम्राज्यवादी शक्तियां उनका इस्तेमाल अपने हितों के लिए करती रहती हैं
इजारेदार ओद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित सरकारें उन्ही के हितों के लिए कार्य करती हैं आज दुनिया में भूंख प्यास से लेकर प्रत्येक चीज पर इनका कब्ज़ा हो चुका हैहवा पानी से लेकर सभी प्राकृतिक सोत्रों को भी इन लोगों ने बरबाद कर दिया हैमुनाफा इनका धर्म है, नरसंहार इनका अस्त्र हैसारे नागरिकों को गुलाम बनाना इनका मुख्य उद्देश्य हैअपने उद्देश्य के लिए ये ताकतें सम्पूर्ण मानवता को भी नष्ट कर देंगीइनका लोकतंत्र, स्वतंत्रता, न्याय, शान्ति में विश्वाश नही हैये शब्द इनके लिए मानवता को ध्वंश करने के औज़ार हैं

सुमन
loksangharsha.blogspot.com


बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद सरकार ने लिब्रहान आयोग की स्थापना की थी। जिसकी रिपोर्ट संसद में पेश नही हुई कि उससे पूर्व मीडिया ने उसको प्रसारित कर दिया जिसको लेकर संसद में जबरदस्त हो हल्ला हंगामा हुआ। सरकार जब महंगाई के मोर्चे पर जबरदस्त तरीके से असफल है तो लोगो का ध्यान हटाने के लिए लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट की लीकेज़ का ड्रामा शुरू कर दिया है । जिससे जनता का ध्यान मूल समस्याओं का ध्यान हटा रहे। लिब्रहान आयोग की आयोग भी स्पष्ट तरीके यह कहती है की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उनके अनुशांगिक संगठनों ने योजनाबद्ध तरीके से बाबरी मस्जिद को तोडा था । केन्द्र सरकार में यदि जरा सा भी नैतिक साहस है तो ऐसे संगठनों के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दे जो देश की एकता और अखंडता को क्षति पहुंचाते है ।
कांग्रेस की धर्म निरपेक्ष सोच बदल चुकी है जिसके चलते फांसीवादी संगठन बढ़ते हैं और देश के अन्दर दंगे फसाद शुरू होते हैं । महाराष्ट्र के अन्दर भी शिव सेना की गतिविधियाँ जारी रखने में समय-समय पर कांग्रेस सरकार का भी संरक्षण रहता है अन्यथा राज ठाकरे बाल ठाकरे जैसे लोग पनप ही नही सकते हैं । लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव की भूमिका को स्पष्ट नही किया है। श्री नरसिम्हा राव साहब ने अगर चाहा होता तो बाबरी मस्जिद को आराजक व फांसीवादी तत्व गिरा नही सकते थे । आज भी इन तत्वों का प्रचार अभियान जारी है समय रहते हुए यदि उचित कार्यवाही नही की गई तो यह देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा होंगे व एक नया आयोग बनेगा और उसकी भी रिपोर्ट लीक होगी ।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन ( मंत्री पद प्राप्त ) वरिष्ट अधिवक्ता पूर्व एडवोकेट ज़नरल श्रीएस.एम काजमी ने एस.टी.एफ द्वारा खालिद मुजाहिद को 16 दिसम्बर 2007 को मडियाहूँ, जिला जौनपुर से पकड़कर २२ दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर आर.डी.एक्स ड़िकोनेटर की बरामदगी दिखाकर जेल भेजदिया था , के मामले में अपने पद की परवाह करते हुए दिनांक 20 नवम्बर 2009 लो माननीय उच्च न्यायलयइलहाबाद खंडपीठ लखनऊ में खालिद मुजाहिद की तरफ़ से जमानत प्रार्थना पत्र पर बहस कीआज की दौर में पदपाने के लिए लोग सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैंवहीं श्री काजमी उत्तर प्रदेश के न्यायिक इतिहास में (जहाँतक मुझे ज्ञात है ) पहली बार सरकार के ग़लत कार्यो के विरोध करने के लिए किसी मंत्री पद प्राप्त व्यक्ति ने किसी अभियुक्त की तरफ़ से वकालत की होज्ञातव्य है कि एस.टी.एफ पुलिस के अधिकारियो ने कचहरी सीरियल बमब्लास्ट (लखनऊ, फैजाबाद, वाराणसी ) में खालिद मुजाहिद तारिक काजमी को घरो से पकड़ कर उक्त वाद मेंअभियुक्त बना दिया था । ऐसा कार्य एक सोची समझी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में हुआ था ।
माननीय उच्च न्यायालय के न्यायधीश न्याय मूर्ति श्री अश्वनी कुमार सिंह ने एस.टी.एफ के वरिष्ट अधिकारी वादके विवेचक तथा क्षेत्र अधिकारी पुलिस मडियाहूँ, जिला जौनपुर को 26 नवम्बर 2009 को न्यायलय में समस्तअभिलेखों की साथ तलब किया है
खालिद मुजाहिद के चाचा मोहम्मद जहीर आलम फलाही द्वारा क्षेत्र अधिकारी मडियाहूँ से सूचना अधिकारअधिनियम के तहत सूचना मांगी थी कि एस.टी.एफ ने किस तारीख को खालिद मुजाहिद को गिरफ्तार किया थाजिस पर क्षेत्र अधिकारी मडियाहूँ ने लिखकर दिया था कि 16 दिसम्बर 2007 खालिद मुजाहिद को एस.टी.एफपकड़ कर ले गई थी
श्री एस.एम काजमी द्वारा माननीय उच्च न्यायलय में निर्दोष युवक खालिद मुजाहिद की तरफ़ से जमानत प्रार्थनापत्र की बहस करने से ये महसूस होने लगा है की इन्साफ दिलाने की लिए लोगो में जज्बा हैकाजमी साहब बधाईकी पात्र हैं

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

आप कहते हैं तो कहा करें! मैं अपने दोस्तों और अपनी बात जरूर करूंगा, अभी हाल ही में मेरे दोस्त सत्येन्द्र राय सपत्नीक मेरे घर आये और हम दोनों दम्पत्तियों के बीच बात शुरू हुई। मेरी पत्नी की तरह सत्येन्द्र राय की पत्नी कामकाजी महिला हैं। दोनों प्राप्त होने वाला अपना वेतन अपने घर पर खर्च करती हैं। यह बात मेरे साथ मेरे मित्र भी स्वीकार करते हैं। घर का खर्च उठाना ही नहीं बल्कि घर के कामकाज की भी जिम्मेदारी दोनों बखूबी संभालती हैं। यह तारीफ मैं अपनी और अपने मित्र की पत्नी को खुश करने के लिए नहीं कर रहा हूं बल्कि उनके सशक्तीकरण पर कुछ सवाल उठा रहा हूं।

हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों को शायद ही कभी कुछ कहते हों सिवाय उनकी तारीफ के, क्योंकि वह तारीफ के लायक हैं। जब बात शुरू हुई तो हम दोनों ने खुले मन स्वीकार किया कि हम खुले मन से निःसंकोच महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं लेकिन अपने घर की महिलाओं की समर्पण की भावना को सहज रूप मेे स्वीकार कर लेते हैं और उनको जी-तोड़ मेहनत से बचाने का प्रयास नहीं करते। इसके पीछे हमारी सोच यह भी हो सकती है कि परिवार रूपी गाड़ी के दोनों पहिये सुगमता से चलते रहें तो गाड़ी रूकेगी नहीं। पति और पत्नी परिवार रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं जिन्हें मिलकर गाड़ी को खींचना होता है।

सच यह है कि परिवार रूपी गाड़ी को चलाने के लिए पहियों को दुरूस्त रखना जरूरी है बिल्कुल उस तरह से जैसे गाड़ी के पहियों को समय-समय पर तेल और ग्रीस देकर चिकना किया जाता है। परिवार की इस गाड़ी के पहियों को पति-पत्नी का पारस्परिक व्यवहार, एक दूसरे के प्रति प्रेम और एक-दूसरे पर भरोसा ही इन पहियों की रफ्तार में तीव्रता लाने के लिए चिकनाई का काम करता है। महिला सशक्तीकरण से आशय यह कभी नहीं लेना चाहिए कि महिला या पुरूष प्राकृतिक नियम को बदल देंगे। प्रकृति ने नर और नारी दोनों को अलग-अलग बनाया ही है इसलिए कि दोनों प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपना-अपना काम करेंगे, लेकिन यह आवश्यक है कि दोनों में पारस्परिक सहयोग बना रहे। दोनों में से कोई एक-दूसरे को हेय दृष्टि से न देखें और न ही वह एक-दूसरे को अपमानित करें। दोनों के लिए एक-दूसरे का सम्मान आवश्यक है लेकिन यह सम्मान प्रेमपूर्ण होना चाहिए।

अक्सर यह देखा गया है कि शादी से पूर्व नर और नारी में एक-दूसरे के प्रति प्रेम होता है और वह प्रेम कभी-कभी इतना परवान चढ़ता है कि दोनों एक दूसरे से शादी कर लेते हैं शादी से पहले लड़का लड़की के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने के लिए तैयार रहता है और लड़की भी लड़के पर अपनी जान न्योछावर करने को तत्पर दिखती है। शादी से पूर्व के इस प्रेम में एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना होती है लेकिन अक्सर ऐसी शादियों में कटुता आते हुये भी देखा है। ऐसा केवल इसलिए कि पुरूष प्रधान इस समाज में शादी के बाद पति मर्द बन जाता है और वह अपनी पत्नी पर अपनी प्रधानता कायम करने का प्रयास करता है, जिसे पत्नी बर्दाशत नहीं कर पाती और परिवार रूपी इस गाड़ी के पहियों की चिकनाई यानी पारस्परिक प्रेम, एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना और एक-दूसरे के प्रति विश्वास समाप्त हो जाता है। पत्नी की यह आकांक्षा कि शादी से पहले जैसा व्यवहार उसका पति करता था, शादी के बाद भी करता रहेगा, पूरी नहीं होती और इस प्रकार निराश होकर वह या तो दुखी होकर साथ निभाती है या फिर साथ छोड़ देती है और परिवार टूट जाता है। परिवार टूटने का एक कारण और भी हो सकता है कि पति धन का लोभी हो और दहेज न मिलने के कारण वह दामपत्य जीवन से अलग हो जाता है। दहेज भी हमारे समाज की एक बढ़ी बीमारी है और सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि संक्रामक बीमारी है। जो भारतीय समाज के हर पंथ में जड़ें मजबूत करती जा रही है। इसका समूल नाश होना चाहिए लेकिन इसका नाश करने के लिए अब तक कोई एन्टीबायटिक दवा नहीं तैयार हो पायी है। इसकी एक ही एन्टीबायटिक दवा है, इसको समाप्त करने की हमारे मन में तीव्र इच्छा पैदा हो। मां-बाप दहेज के बिना अपने बच्चों की शादी करने का संकल्प लें, लड़के दहेज रूपी भीख लेने से बचें और लड़कियां ऐसे परिवार में शादी करने से मना कर दें जहां दहेज की मांग की जाती हो। दहेज की इसी लानत ने हमारे देश के समाज को 1400 वर्ष पूर्व अरब देश के समाज सक बद्तर बना दिया है। 1400 साल पहले अरब देशों में लड़कियों को पैदा होते ही जिन्दा गाड़ दिया जाता था ताकि उनके मां-बाप को किसी के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े या सिर न झुकाना पड़े। आज हमारे देश के समाज ने गर्भ में ही लड़कियों को मार दिया जाता है और इस अपराध में नर-नारी बराबर के दोषी हैं। यह काम केवल इसलिए किया जाता है कि लड़की पैदा होने पर उनके सिर पर दहेज का भार पड़ेगा और लड़की के बाप को अपनी पगड़ी लड़के और उसके बात के चरणों में रखना होगा। कहां हैं वो महिला सशक्तीकरण की बात करने वाले लोग जो इस संक्रामक रोग को समूल नष्ट करने के लिए तैयार हों और सिर्फ तैयार न हों बल्कि इसके विरोध में लड़ाई का बिगुल फूंक दें। अन्यथा एक दिन वो आयेगा जब समाज में लड़कियों का संकट होगा और यह समाज पतन की और बढ़ेगा।

नारी सशक्तीकरण आन्दोलन चलाने वाले लोग यह बात भूल जायें कि नारी सशक्तीकरण का अर्थ पुरूष प्रधान समाज को समाप्त कर नारी प्रधान समाज स्थापित करना है। उन्हें हमेशा यह बात याद रखनी होगी कि समाज न पुरूष प्रधान हो और न नारी प्रधान बल्कि समाज ऐसा हो जिसमें नर-नारी सामंजस्य बना रहे और न तो नर नारी के सिर पर पैर रखकर चले और न ही नारी नर को कुचलने के लिए प्रयासरत हो, इसी में समाज की भलाई है और यही है नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र है।

मुहम्मद शुऐब एडवोकेट
मोबाइल- 09415012666

loksangharsha.blogspot.com

एक खबर को अधिकतर अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी गई, ‘‘मुलायम और कल्याण की दोस्ती समाप्त।’’ राजनीति के पंडित जानते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं हुआ करते। वक्त की जरूरत थी, दोनों ने दोस्ती की। दोनों ने यह दोस्ती, अपने-अपने फायदे के लिए की थी। चूंकि मैं छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा रहा हूं इस कारण आचार्य नरेन्द्र देव, डा0 राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण से परिचित हूं। जब इन लोगों का नाम लेता हूं तो उस शख्सियत को भी नहीं भूल पाता जो समाजवादी आन्दोलन का एक स्तम्भ था जिसे नेताजी (राज नारायण) के नाम से जाना जाता है। हालांकि नेताजी के नाम से केवल सुभाष चन्द्र बोस को ही जाना जाता रहा है लेकिन राज नारायण के लोगों ने उन्हें नेताजी का नाम दिया और धरतीपुत्र कहा। सचमुच धरतीपुत्र ने समय के अनुसार राजनीतिक दोस्ती उन लोगों से भी की जिन्हें वह राजनीतिक दुश्मन मानते थे लेकिन सिद्धान्त विरोधी राजनीतिक दुश्मन का साथ उन्होंने केवल इसलिए पकड़ा कि उनके नेता डा0 राम मनोहर लोहिया देश में सही लोकतंत्र देखना चाहते थे और सही लोकतंत्र स्थापित करना चाहते जिसके लिए वह राजनीति में व्यक्तित्व पूजा और वंशवाद का मूल नष्ट करने के प्रयास में रहे। डा0 राम मनोहर लोहिया के शब्दों में, ‘‘मैं जानता हूं कि मैं एक चट्टान से टकरा रहा हूं और यह भी जानता हूं कि चट्टान को नहीं तोड़ सकूंगा लेकिन मुझे विश्वास है कि दरार जरूर डाल दूंगा।’’ यह शब्द उनके उस वक्त के थे जब वह पं0 जवाहर लाल नेहरू के मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे। एक वाक्य और उद्धृत करता हूं डा0 राम मनोहर लोहिया का, जब उन्होंने ग्वालियर की महारानी के खिलाफ सुक्खो रानी को चुनाव मैदान में उतारा था, ‘‘लोकतंत्र में लोक प्रतिनिधि का चुनाव होता है और यही कारण है कि ग्वालियर के चुनाव में एक तरफ है ग्वालियर की महारानी तो दूसरी तरफ है हमारी उम्मीदवार हैं सुक्खो रानी।’’

समाजवाद के दार्शनिकों का यह मूलमंत्र समाप्त हो गया और समाजवादी आन्दोलन सुविधा और भोग की राजनीति में खो गया और समाजवादी नेता और कार्यकर्ता जो सुविधा और भोग की राजनीति में अपना स्थान बना सके, जीवित हैं, अन्यथा खो गये।

समाजवादी आन्दोलन तो नहीं रहा, लेकिन समाजवाद के नाम पर डा0 राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव के नाम पर शोषण की राजनीति शुरू हो गई और समाजवादी पार्टी ने जन्म लिया। इस पार्टी में सुविधा भोगी जातिवादी और सम्प्रदायवादी लोगों ने गठजोड़ किया और जिसके विरूद्ध समाजवादी नेता लड़ते रहे वही इस पार्टी में परवान चढ़ा और वह है वंशवाद। मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राम नारायण यादव और अखिलेश यादव। भाई-भतीजावाद पर उठार-प्रहार करने वाली राजनीति पर भाई-भतीजावाद हावी हो गया। साम्प्रदायिकता और जातिवाद का बोलबाला रहा। मुझे याद है कि जब हम समाजवादी योजन सभा संसोपा और सोपा के लोग जाति तोड़ो सम्मेलन किया करते थे, आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले दलितों को विशेष अवसर दिलवाने के लिए संघर्ष करते थे, आये दिन जगह-जगह सहभोज का आयोजन करते थे, भाई-भतीजावाद को मानना एक गाली समझते थे, आज हम उन्हीं मूल्यों को जीति रखकर अपने को समाजवादी घोषित करने में गर्व महसूस करते हैं। अब अगर मुलायम सिंह यादव भाई-भतीजावाद और वंशवाद को अग्रसर करने के लिए अपने ही जैसे चरित्र के व्यक्ति से दोस्ती करता है और दोस्ती करने के नतीजे में अपनी नींव खिसकती हुई देखकर दोस्ती समाप्त करता है तो इसमें कैसा विश्वासघात?

कल्याण सिंह जो एक समय में बावरी मस्जिद गिराने के दोषी रहे, भारत के संविधान की धज्जियां उड़ायी, अपने ही देश के कानून को जूतों की नोंक पर रखा, भारतीय जनता पार्टी से अलग होने के बाद उन्हें भी सहारे की जरूरत थी और अपनी इसी जरूरत को पूरा करने के लिए मुलायम सिंह का हाथ थामा। आवश्यकता के अनुसार हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और मन्दिर आन्दोलन से जोड़ कर सत्ता में भागीदार बनाने के उद्देश्य से जब उन्हें मुलायम का साथ अच्छा लगा साथ हो लिए और जब यह साथ दोनों के लिए नुकसानदेह लगा तो दोनों ही अलग हो गये। ये थी स्वार्थ की राजनीति, फिर यह कहा जाय कि मुलायम ने कल्याण सिंह के साथ विश्वासघात किया या कल्याण सिंह ने मुलायम सिंह के साथ विश्वासघात किया, कोई मायने नहीं रखता और सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि जब दोनों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी साथ रहे और जब जरूरत समाप्त हुई तो अलग हो गये।

सिर्फ इन्हीं दोनों नेताओं को नहीं बल्कि देश के किसी दल या दल के किसी नेता को देश की चिन्ता नहीं है और अगर चिन्ता है तो सिर्फ अपने स्वार्थ की। जिस नेता का स्वार्थ जिस दल से सिद्ध होता है, वह उसके लिए उस समय तक वफादार रहता है जब तक कि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहे, स्वार्थ टकराने के बाद वह जिस दल के प्रति वफादार रहा है उसका साथ छोड़कर उस दल के साथ हो लेता है जहां पर उसके स्वार्थ सिद्धि की गुंजाइश हो।

यही कारण है मुलायम सिंह और कल्याण सिंह का एक-दूसरे के साथ विश्वासघात का। अगर दोनों को अपने स्वार्थ की चिन्ता न होकर देश की चिन्ता होती तो दोनों को यह कभी न लगता कि दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात किया। सच तो यह है दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात न करके हमेशा देश के साथ विश्वासघात किया है, कर रहे हैं और करते रहेंगें, इसलिए आवश्यक है कि अपना भला छोड़कर देश का भला चाहने वाले एक साथ उठें और जन-जागरण चलाकर देश के कल्याण के लिए स्वार्थ त्यागकर आगे बढ़ें, इसी में हमारी भलाई है।

मुहम्मद शुऐब एडवोकेट
मोबाइल - 9415012666

loksangharsha.blogspot.com

मो0 खालिद मुजाहिद और मो0 तारिक कासमी के बाद तीन लोगों का नाम कचहरी ब्लास्ट में पुलिस द्वारा जोड़ा गया, इन तीनों लोगों में एक है आफताब आलम अंसारी पुत्र स्व0 अब्दुल अज़ीज निवासी काशीपुर रोड, थाना काशीपुर, जिला कोलकाता, दूसरा सज्जादुर्रहमान पुत्र गुलाम कादिर निवासी कोछार किन्दवार, थाना छात्रू, जिला किस्तवाड़, जम्मू कश्मीर तथा तीसरा मो0 अख्तर पुत्र शाबिर वानी निवासी बनकोट बनिहाल, थाना रामबाण, जम्मू कश्मीर। आफताब आलम अंसारी का नाम पुलिस ने पहली बार मुख्तार उर्फ राजू रखा और बाद में असली नाम आफताब आलम अंसारी रखा तथा उसकी गिरफ्तारी के विवेचना अधिकारी ने दि0 26.12.07 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एस0टी0एफ0 से अनुरोध किया। अनुरोध के आधार पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एस0टी0एफ0 ने अजय चतुर्वेदी निरीक्षक को आफताब आलम अंसारी की गिरफ्तारी के लिए भेजा, जो दि0 27.12.07 को गये और 28.12.07 को एस0ओ0जी0/सी0आई0डी0 पश्चिम बंगाल की सहायता से आफताब आलम अंसारी को गिरफ्तार किया, arrest memo और seizure memo तैयार किया और दि0 29.12.07 को चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, 24 परगना पश्चिम बंगाल से ट्रांजिट रिमाण्ड लेकर दि0 1.1.08 को 17:20 बजे थाना वजीरगंज, लखनऊ में दाखिल किया और विवेचना अधिकारी को एक पत्र प्रेषित किया जो नीचे उद्धृत है:-

सेवा में,
श्री सी0एन0 सिन्हा,
क्षेत्राधिकारी,
चैक, लखनऊ।

विषयः अभियुक्त आफताब आलम अंसारी s/o स्व0 अब्दुल अज़ीज संबंधित मु0अ0सं0-547/07 थाना वजीरगंज, लखनऊ की गिरफतारी के विषय में अनुपालन आख्या।

महोदय,
कृपया आप अपने पत्र सं0 वाचक सी.ओ.सी.वि. के 0/07 दिनांकित 26.12.07 का संदर्भ ग्रहण करने का कष्ट करें जिसके माध्यम से आप द्वारा अभियुक्त आफताब आलम अंसारी s/o स्व0 अब्दुल अजीज त्ध्व काशीपुर कलकत्ता की गिरफ्तारी हेतु-एक टीम कलकत्ता भेजने हेतु वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एस0टी0एफ0 उ0प्र0, लखनऊ से अनुरोध किया गया था।

आपके उक्त अनुरोध पर कार्यालय एस0टी0एफ0 से मुझ उ0नि0 को मय हमराह फोर्स के दि0 27.12.07 को कलकत्ता भेजा गया था। कलकत्ता पहुंचकर दि0 28.12.07 को वांछित अभियुक्त आफताब आलम अंसारी (a) राजू (a) मुख्तार s/o स्व0 अब्दुल अजीज को नियमानुसार गिरफ्तार किया गया। ।Arrest memo व seizure memo तैयार किया गया। गिरफ्तारी के उपरान्त दि0 29.12.07 को अभियुक्त को माननीय सी0जे0एम0 जनपद द0 24 परगना प0 बंगाल के न्यायालय में प्रस्तुत कर Transit remand श्रीमान न्यायालय ने 5 दिन की अवधि का Transit Remand स्वीकृत किया।

तदोपरान्त मैं अपनी हिरासत/निगरानी में अभियुक्त को लेकर आज दि0 1.1.08 को वापस ालखनऊ आया हूं व नियमानुसार अभियुक्त को वहवाले रपट नं0 41 समय 17ः20 बजे रो0आम0 ता0 1.1.08 थाना वजीरगंज, लखनऊ थाना वजीरगंज पर हासिल किया गया है।

अभियुक्त को दि0 2.1.08 को मान0 सी0जे0एम0 लखनऊ के समक्ष पेश किया जाना है।

सभी संबंधित प्रपत्र इस आशय से संलग्न कर प्रस्तुत है कि निर्देशानुसार अग्रिम तिथि कार्यवाही करने का कष्ट करें।

सादर।

संलग्नकः
1- आपका पत्र सं0 वाचक/coc विवे./07 दि0 26.12.07 की छायाप्रति - 1 वर्क।
2- ssp/stf UP लखनऊ के आदेश सं0 ST/STF 18(80)/007 दि0 27.12.07 की छायाप्रति - 1 वर्क।
3- SOG/CID (WB) से पुलिस सहायता हेतु प्रेषित पत्र की छायाप्रति - 1 वर्क।
4- ।Aresst memo की कार्बन प्रति - 1 वर्क।
5- Seuizure memo कार्बन प्रति - 1 वर्क।
6- Lock Up Challan की द्वितीय प्रति - 1 वर्क।
7- Transit Remand हेतु प्रेषित पत्र की द्वितीय प्रति - 1 वर्क।
8- न्यायालय C.J.M जनपद द. 24 परगना के व्तकमत ैीममज की प्रमाणित प्रति - 1 वर्क।
9- एक बंद लिफाफा संबंधित मान. ब्ण्श्रण्डण् लखनऊ प्रेषक ब्ण्श्रण्डण् प0 बंगाल।


(अजय चतुर्वेदी)
उ.नि.
ैज्थ् न्च्ए लखनऊ।

दि0 2.1.07 को न्यायालय में उपस्थित करके आफताब आलम अंसारी को रिमाण्ड पर लिया गया और गहन पूछताछ करने के लिए उसे एस0टी0एफ0 आॅफिस में रखा गया तथा प्रताड़ित करके उससे बार-बार एस0टी0एफ0 के अधिकारियों द्वारा कहा गया कि वह स्वीकार कर ले कि वही राजू उर्फ मुख्तार है और कचहरी बम ब्लास्ट में शामिल था। जाड़े की रात में उसे बर्फ की सिल्ली पर लिटाया जाता, रस्सी में बांधकर लटकाया जाता, रस्सी और डण्डे में बांधकर मुर्गा बनाया जाता, पैर के तलवों पर डण्डे से मारा जाता, सिगरेट से उसके शरीर के अंगों को जलाया जाता रहा लेकिन अन्त में विवेचना अधिकारी द्वारा मेरे कागजात मुहैया कराने पर अन्तिम रिपोर्ट लगा दी गई और न्यायालय के आदेश से उसे छोड़ दिया गया। रिपोर्ट तथा न्यायालय द्वारा पारित आदेश नीचे उद्धृत है:-

सेवा में,
माननीय न्यायालय,
ए0सी0जे0एम0, अयोध्या प्रकरण,
जनपद लखनऊ।

विषयः मु0अ0सं0 547/07 धारा 115,120बी,121,121ए,122,124ए,307, भादवि व 16/18/20/23 विधि विरूद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधि0 व 3/4/5/6 विस्फोटक पदार्थ अधि0 थाना वजीरगंज, लखनऊ में गिरफ्तार अभियुक्त आफताब आलम अंसारी उर्फ मुख्तार उर्फ राजू पुत्र स्व0 अब्दुल अजीज निवासी गोला बाजार, नया मोहल्ला मास्टर कालोनी थाना गोला बाजार, जिला गोरखपुर हाल पता-95/1/2/एच/3, काशीपुर रोड थाना काशीपुर कलकत्ता दो को धारा 169 द0प्र0सं0 के अन्तर्गत रिहा करने के सम्बन्ध में।

महोदय,
निवेदन है कि आफताब आलम अंसारी उर्फ मुख्तार उर्फ राजू नाम पता उपरोक्त मु0अ0सं0 547/07 थाना वजीरगंज धारा उपरोक्त मे कलकत्ता से गिरफ्तार करके लाया गया था, जिसे न्यायिक हिरासत में दिनांक 2.1.08 को जेल, लखनऊ भेजा गया तथा अभियुक्त आफताब आलम अंसारी उपरोक्त को पुलिस कस्टडी रिमान्ड हेतु माननीय न्यायालय से प्रार्थना की गयी। माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक 8.1.08 से दिनांक 14.1.08 की सुबह तक पुलिस कस्टडी रिमान्ड में दिया गया है।

आफताब आलम अंसारी उपरोक्त से पूछताछ व अन्य विवेचना से उक्त आफताब आलम अंसारी के विरूद्ध अभी तक कोई ऐसी साक्ष्य नहीं है जिससे कि न्यायिक हिरासत में रखा जा सके।

अतः प्रार्थना है कि आफताब आलम अंसारी उर्फ मुख्तार उर्फ राजू पुत्र स्व0 अब्दुल अजीज निवासी गोला बाजार नया मोहल्ला मास्टर कालोनी थाना गोला बाजार, जिला गोरखपुर हाल पता पता-95/1/2/एच/3, काशीपुर रोड थाना काशीपुर कलकत्ता को मु0अ0सं0 547/07 धारा 115,120बी,121,121ए,122,124ए,307, भादवि व 16/18/20/23 विधि विरूद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधि0 व 3/4/5/6 विस्फोटक पदार्थ अधि0 थाना वजीरगंज, लखनऊ को धारा 169 द0प्र0सं0 में रिहा करने की कृपा करें।

दिनांकः जनवरी 14, 2008

(राज नारायण शुक्ल)
पुलिस उपाधीक्षक, अपराध
जनपद लखनऊ
(विवेचक)


न्यायालय: विशेष अपन मुख्य न्यायिक मजि0सी0बी0आई0(अ0प्र0), लखनऊ।

16.1.08

आदेश

विवेचक श्री राज नारायण शुक्ल, पुलिस उपाधीक्षक अपराध, लखनऊ की तरफ से आरोपी आफताब आलम अंसारी उर्फ मुख्तार उर्फ राजू, अंतर्गत अ0सं0-547/07, धारा 115,120 बी,121,121ए,122,124ए,307, भा0द0सं0 व 16/18/20/23 विधि विरूद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधि0 व 3/4/5/6 विस्फोटक पदार्थ अधि0 थाना वजीरगंज, लखनऊ के सम्बन्ध में दाखिल रिपोर्ट अं0 धारा-169 द0प्र0सं0 पर विवेचक एवं सहायक अभियोजन अधिकारी को सुना।

विवेचक की तरफ से अपनी केस डायरी में इस आशय का उल्लेख किया गया है कि आफताब आलम अंसारी की मां ने उसका पहचान पत्र दिया है उसमें उसका नाम राजू उर्फ मुख्तार अंकित नहीं है। इस प्रकार में निरूद्ध अन्य अभियुक्तगण खालिद, सज्जाद एवं मोहम्मद अख्तर से पूछताछ में विवेचक के अनुसार अभियुक्तांे ने बताया है कि अभियुक्त आफताब आलम अंसारी उर्फ मुख्तार उर्फ राजू नहीं है। विवेचक ने केस डायरी में यह भी उल्लेख किया है कि विभिन्न सूत्रों से पता चला है कि आफताब आलम अंसारी, मुख्तार उर्फ राजू नहीं है और न ह ीवह गलत विधियों में संलिप्त है। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि आफताब आलम अंसारी को मुख्तार उर्फ राजू के नाम पर गिरफ्तार किया गया है। इस प्रकार गिरफ्तारी में पहचान सम्बन्धी भूल की गयी है क्योंकि विवेचक ने निरूद्ध आरोपी आफताब आलम अंसारी के विरूद्ध कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं पाया है, इसलिये वहां न्यायिक अभिरक्षा से मुक्त किये जाने योग्य है। अतः तद्नुसार विवेचक की आख्या अं0 धारा-169 द0प्र0सं0 स्वीकार की जाती है व आफताब आलम अंसारी को मु0-10,000/- रूपये का व्यक्तिगत बंधपत्र दाखिल करने पर उसे न्यायिक अभिरक्षा से मुक्त किया जाता है। रिहाई परवाना जेल भेजा जाये।



(आर0पी0 त्रिपाठी)
विशेष अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट,
सी0बी0आई0 (अयो0प्रकरण)
लखनऊ।

बात आरम्भ करता हूं उस शोर की तरफ जो 1992 के बाद हल्की आवाज में, 2001 से 2008 तक ऊंची और तेज आवाज में उठी थी कि भारत में सभी बम धमाके मुसलमान करते हैं, हर धमाके में लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों का हाथ है जिसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों के मुसलमान भी जुड़े हैं फिर हर धमाके में सिमी हाथ है और फिर भारतीय मुसलमान आतंकवादी और देश द्रोही है और आगे सिमट कर हर मुसलमान आतंकवादी नहीं लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान है। कश्मीर से बाहर निकलकर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे प्रदेशों में आतंकवादी कहकर मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारियां शुरू हुईं और 2007 में उत्तर प्रदेश की पुलिस भी ऊपर वर्णित किये गये प्रदेशों की पुलिस के साथ तालमेल बनाकर मुसलमान नौजवानों को गिरफ्तार करने लगे। मैं ये कदापि नहीं कहता कि मुसलमान नौजवान आतंकवादी नहीं हो सकते लेकिन यह जरूर कहता हूं कि गिरफ्तार किये गये मुस्लिम नौजवानों में उन लोगों की संख्या अधिक है जो निर्दोष हैं। अगर घटनाक्रम पर विवेचनात्मक दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि घटना के पीछे कोई साजिश काम कर रही है। बात बहुत पीछे नहीं ले जाना चाहता और न ही संघ परिवार के इतिहास और उसके क्रिया-कलाप पर कुछ कहना चाहता हूं, लखनऊ कचहरी में अधिवक्ताओं के एक विशिष्ट ग्रुप द्वारा आतंकवाद के अभियुक्तों पर न्यायालय परिसर में हमला किया गया और फिर इस घटना को प्रचारित और प्रसारित किया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी की कचहरियों में बम विस्फोट किये गये जिसके फलस्वरूप वाराणसी और फैजाबाद में अधिवक्ता सहित कई लोगों की जानें गईं। सचमुच यह घटना निन्दनीय है और आवश्यक है कि इस घटना की सही विवेचना होकर दोषी व्यक्तियों को कठोरतम सजा दिलाई जाये।

मैं कह रहा था कि आतंकवाद के अभियुक्तों पर पहले हमला हुआ फिर न्यायालय परिसर में धमाके हुये और उन धमाकों के साथ एक अफवाह ने तेजी पकड़ी कि आतंकवादियों ने अपने ऊपर हुए हमले के जवाब में कचहरी परिसर में धमाके कराये, लेकिन पुलिस की विवेचना में कचहरी परिसर के बम ब्लास्ट के अभियुक्तों का किसी प्रकार का सम्बन्ध उन अभियुक्तों से नहीं दर्शाया गया है जिन पर लखनऊ कचहरी परिसर में वकीलों के ग्रुप द्वारा हमला किया गया था। जिससे स्पष्ट होता है कि कचहरी परिसर के ब्लास्ट पुलिस और कुछ संगठनों की साजिश के नतीजे है। लेकिन उन संगठनों का नाम का उल्लेख उपयुक्त स्थान पर ही करूंगा।

कचहरी परिसर में हुये ब्लास्ट के दो अभियुक्तों की गिरफ्तारी का स्थान बाराबंकी रेलवे स्टेशन से बाहर और दि0 22.12.07 उत्तर प्रदेश पुलिस ने बताया है। इन दोनों अभियुक्तों का नाम क्रमशः मो0 तारिक काजमी और मो0 खालिद मुजाहिद पुलिस द्वारा बताया गया है और इसके लिए अपनी पीठ थपथपाते हुए पुलिस ने प्रथम सूचना रपट में लिखा है, "तभी अचानक दोनों अपना-अपना बैग उठाकर स्टेशन की मुख्य सड़क की ओर चलने लगे कि मुझ सी0ओ0, चैक द्वारा आगे बढ़कर अपना परिचय देते हुए उन्हें रूकने के लिए कहा तो सकपका कर और तेजी से चलने लगे कि हमराही कर्मचारीगणों की मदद से गिरफ्तार करना चाहा तो दोनों अपना बैग खोलने जैसी हरकत करने लगे कि ये जानते हुये कि यह आतंकवादी हैं और सूचना अनुसार इनके पास विस्फोटक सामग्री है फिर भी अपनी जान जोखिम में डालकर कर्तव्यनिष्ठा की पराकष्ठा का परिचय देते हुए अदम्य शौर्य व साहस का प्रदर्शन कर उ0नि0 विनय कुमार सिंह, उ0नि0 धनंजय मिश्रा, का0 नीरज पाण्डे, का0 ओम नरायण सिंह, का0 कमान्डो जय प्रकाश गुप्ता ने पकड़ लिया ते दोनों द्वारा लपटा-झपटी करते हुये मुजाहमद करने लगे तथा जान से मारने की धमकी देते हुए आतंकी परिणामों से भुगतने की चेतावनी देने लगे कि बामुश्किल आवश्यक बल प्रयोग कर टीम के अन्य सदस्यों की मदद से समय सुबह करीब ६.00 बजे पकड़ लिये गये तभी अन्य टीमें भी शोर-शराबा सुनकर आ गई।"

उक्त वर्णित प्रथम सूचना रपट में जिस तारिक काजमी का नाम आया है वह तारिक काज़मी नहीं तारिक कास़मी है जिसको पुलिस ने कासमी से काज़मी बना दिया। यह वही मो0 तारिक कासमी है जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट उनके दादा अजहर अली ने दि0 14.12.07 को थाना रानी की सराय, जिला आजमगढ़ में दर्ज करायी थी, जिसका उल्लेख उक्त थानो के रोजनामचा-आम दि0 14.12.07 के क्रम सं0-20 पर समय 10ः30 पर दर्ज है। अज़हर अली द्वारा दि0 20.12.07 को चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, आजमगढ़ के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किया गया कि उनके पोते तारिक कासमी का अता-पता पुलिस नहीं लगा रही है और दबी ज़बान से कहा जा रहा था कि उठाने वाले एस0टी0एफ0 के लोग थे, परिवाद में यह भी कहा गया कि दि0 18/19.12.07 को रात में पुलिस के लोग 3 गाड़ी में गये और उनके घर में घुसकर काफी सामान इधर-उधर फेंक दिया, घर में रखी धार्मिक किताबों तथा कुछ कीमती सामान भी उठा ले गये, मना करने पर सब लोगों को फर्जी मुकदमे में फंसा देने की धमकी दी। 14.12.07 को ही पुलिस महानिदेशक उ0प्र0, गृह सचिव, मुख्यमंत्री , राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, पुलिस महानिरीक्षक, वाराणसी तथा पुलिस अधीक्षक, आजमगढ़ को भी प्रार्थना-पत्र भेजा। नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी की तरफ से आजमगढ़ में लगातार धरना-प्रदर्शन किया जाता रहा और तारिक कासमी एस0टी0एफ0 द्वारा उठाये जाने की खबरें अखबारों में छपती रहीं, फिर भी पुलिस महानिदेशक तक को अज़हर अली द्वारा दिये गये प्रार्थना-पत्र पर कोई कार्यवाही नहीं हुई और पुलिस की बेशर्मीपूर्ण धृष्टता इतनी बढ़ी कि उसने 22.12.07 को तारिक कासमी की गिरफ्तारी बाराबंकी रेलवे स्टेशन के बाहर से दिखा दी।
इस मुकदमें का दूसरा अभियुक्त बनाया गया मो0 खालिद मुजाहिद निवासी महतवाना, मड़ियाहूं, जिला जौनपुर जो मड़ियाहूं के एक मदरसे में अध्यापन कार्य करते थे। 16.12.06 की शाम को लगभग 6ः30 बजे जब वो मड़ियाहूं बाजार के लिए निकले और चाट की दुकान पर खड़े थे उसी समय बिना नम्बर की टाटा सूमो आयी और उसमें से उतरकर जवानों ने टाटा सूमो में ठूंस दिया। वहां खड़े लोग कुछ भी समझ नहीं पाये। सूचना पाते ही मो0 खालिद के चचेरे भाई शाहिद ने थाना मड़ियाहूं जाकर घटना की लिखित सूचना दी तथा मो0 खालिद के चाचा मो0 जहीर आजम फलाही जो बाहर थे मड़ियाहूं पहुंचने पर मो0 खालिद की उठाये जाने की सूचना थाना मड़ियाहूं में दी और फिर जिलाधिकारी, जिला पुलिस अधीक्षक, जौनपुर, मुख्यमंत्री, गृहसचिव तथा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग सहित अनेक अधिकारियों के पास प्रार्थना-पत्र भेजकर फरियाद किया। घटना की खबर 17.12.07 को हिन्दुस्तान तथा अमर उजाला में छपीं जो नीचे उद्धृत हैं:-

हिन्दुस्तान - दि0 17.12.07 - टाटा सूमो सवार लोगों ने युवक का उठाया

स्थानीय नगर में स्थित पवन चित्र मन्दिर के सामने से रविवार की शाम टाटा सूमो सवार लोगों ने एक युवक को जबरन उठा ले गये। स्थानीय लोगों का कहना है िकवह पुलिस महकमे के लग रहे थे। मो0 खालिद पुत्र ज़हीर निवासी मोहल्ला महतवाना को सायं साढ़े सात बजे एक टाटा सूमो में सवार आधा दर्जन लोग आये और उसे जबरन टाटा सूमो में बैठाकर चल दिये। इस सम्बन्ध में उसके चचेरे भाई शाहिद ने कहा कि इलाहाबाद मदरसा कांड के बन्द मदरसों की जांच के नाम पर अक्सर स्थानीय खुफिया एजेंसी खालिद के ऊपर नजर रखे हुए थे। इसके प्रति पूरी जानकारी, पूछताछ कर इकट्ठा कर की रही थी। शाहिद के अनुसार भाई खालिद मिर्दहा मोहल्ले में स्थित एक मदरसे में अध्यापन कार्य करता था, जिसका संचालन उसके परिवार के लोग करते थे। प्रतिदिन देर शाम होने के बाद ही वह वापस घर आता था। आज उसे पवन टाकीज़ के सामने से कुछ लोग बिना नंबर की टाटा सूमो से उठा ले गये। शाहिद ने कहा कि घटना की सूचना जहीर को दूरभाष पर दे दी है तथा स्थानीय थाना को भी लिखित सूचना देने जा रहा हूं।

अमर उजाला - दि0 17.12.07-एस0टी0एफ0 ने चाट खा रहे युवक को उठाया

स्पेशल टास्क फोर्स (एस0टी0एफ0) ने रविवार की शाम नगर से एक युवक को उठा लिया। उसे किसी मामले में पूछताछ के लिए किसी अज्ञात स्थान पर ले गई है। तीन दिनों से एसटीएफ का दस्ता उसकी तलाश में नगर में भ्रमण करता रहा।

नगर के महतवाना मोहल्ले का वर्ग विशेष का एक युवक रविवार की शाम करीब ६:५ बजे पवन टाकीज़ के पास एक दुकान पर चाट खा रहा था। तभी क्वालिस और टाटा सूमा पर सवार होकर पहुंचे एसटीएफ के दस्ते ने उसे कवर कर लिया और वाहन में बैठाकर लेकर चला गया। उसे किस मामले में उठाया गया इसे लेकर उटकलों का दौर चल रहा है। नगर में तीन दिनों से एसटीएफ का दस्ता भ्रमण करता दिख रहा था।

अमर उजाला - दि0 18.12.07-एस0टी0एफ0 की हिरासत में हूजी के दो आतंकी
कचहरी में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में एसटीएफ ने पूर्वांचल के जौनपुर, इलाहाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छापा मारकर दो लोगों को हिरासत में लिया। शक है कि पकड़े गये लोग हूजी से जुड़े इस मामले में विभिन्न एजेन्सियों के जुड़े अधिकारी पकड़े गए लोगों से पूछताछ कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि कचहरी में बीते 23 नवम्बर की दोपहर आतंकयों ने सीरियल बम ब्लास्ट कर दिया। तेज धमाके के दौरान तीन अधिकवक्ताओं समेत नौ लोगों की जानें गईं। साथ ही दर्जनों लोग लहूलुहान हो गए। स्थानीय पुलिस की जांच से पता चला कि आतंकियों ने साइकिल पर बम रखकर घटना को अंजाम दिया था। दोनों साइकिलें पुरानापुर व पाण्डेयपुर से खरीदी गईं थी। आई0जी0 जोन कश्मीर सिंह ने दुकानदारों से पूछताछ के आधार पर संदिग्ध आतंकियों की स्केच जारी किया और उनका पता बताने वाले को 10 हजार इनाम देने की घोषणा की।

पुलिस की काफी तलाशी के बावजूद किसी व्यक्ति न आतंकियों के बारे में ठोस जानकारी नहीं दी। इस मामले में बम डिस्पोजल टीम की जांच से पता चला कि घटना में आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया था। इसकी पुष्टि आगरा प्रयोगशाला की रिपोर्ट ने की। आतंकियों का पता लगाने के लिए जिले की पुलिस टीमें राजस्थान और बिहार गईं लेकिन उनका सुराग नहीं मिल सका। इधर एस0टी0एफ0 की टीम ने पश्चिम उत्तर प्रदेश व इलाहाबाद में छापा मारकर हूजी के दो सदस्यों को हिरासत में ले लिया। दोनों की निशानदेही पर कोरियर कर्मी को परठकोठी से हिरासत में लिया गया है। इसी प्रकार जौनपुर जिले के मड़ियाहूं स्थित मदरसा में पढ़ाने वाले एक अध्यापक को भी हिरासर में लिया गया है। पुलिस अधिकारियों व विभिन्न एजेंसियों की टीमें पकड़े गए लोगों से पूछताछ कर रही है। पूछताछ में शामिल लोगों ने संकेत दिया है घटना हूजी ने अंजाम दिया है। इसका खुलासा दो लोगों की गिरफ्तारी के बाद शीघ्र कर दिया जायेगा।

अमर उजाला - दि0 20.12.07 - एस0टी0एफ0 ने युवक को उठाया, छोड़ा

स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने बीती रात नगर के महतवाना मोहल्ले में एक घर पर दबिश दी। इसी घर के एक युवक को एसटीएफ ने बीते रविवार को उठा लिया था। आरोप है कि एसटीएफ के जवानों ने पूरे घर को खंगाला और धार्मिक पुस्तकें भी कब्जे में ले लीं। युवक को थाना कोतवाली ले जाकर तीन घंटे ते पूछताछ की। सादे कागज पर हस्ताक्षर कराने के बाद धमकी देकर छोड़ा ।

नगर के महतवाना मोहल्ला निवासी मोहम्मद खालिद नामक युवक को बीते रविवार की शाम सदरगंज मेन रोड से क्वालिस और टाटा सूमो सवार लोगों ने उठा लिया था। उसे अज्ञात स्थान पर रखा गया है। खालिद के चाचा मोहम्मद जहीर आलम ने उच्चाधिकारियों को भेजे गये प्रार्थना-पत्र में लिखा है कि मंगलवार की रात करीब १२:० बजे तीन वाहनों पर सवार होकर 15 लोग उसके घर पहुंचे। गेट पीटने के साथ ही आवाज लगाने लगे। जहीर के अनुसार वह कमरा खोलकर बाहर आया तो उन लोगों न बताया कि वह मड़ियाहूं कोतवाली से आए हैं और खालिद के बारे मंे बातचीत करना चाहते है। वह लोग घर के सभी कमरों में गए। खास तौर पर खालिद का कमरा पूछा, धार्मिक और उर्दू की कुछ अन्य किताबें भी उठा ले गए।

अमर उजाला - 22.12.07 - आतंकियों के संपर्क में था मौलाना खालिद

कस्बे के महतवाना मोहल्ले का मौलाना खालिद आतंकियों के संपर्क में था। पुलिस सूत्रों की मानें तो आई बी पिछले छः महीने से लगी हुई थी। आईबी की रिपोर्ट पर ही एसटीएफ ने पीछा किया। 16 दिसम्बर को मौलाना खालिद की कस्बे की चाट दुकान से एसटीएफ ने ही उठाया था। पुलिस की माने तो मौलाना खालिद आतंकियों के संपर्क में था। इलेक्ट्रानिक्स सर्विलांस तो फिलहाल कुछ इसी ओर संकेत दे रहे है। मौलाना खालिद को उठाने से पहले पुलिस को पता था कि महतवाना मोहल्ले में एक कश्मीरी नागरिक आया था। यह बात मौलाना खालिद के चाचा जहीर आलम फलाही भी स्वीकार करते है। हालांकि जब पाकिस्तानी नागरिक आया था तो वे घर में नहीं थे। अब जहीर आलम फलाही कह रहे हैं कि सामाजिक लिहाज से ही उन्होंने कश्मीरी नागरिक को घर में रखने पर आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्हें नहीं पता कि कश्मीरी नागरिक कौन था। इलेक्ट्रानिक्स सर्विलांस के जरिए रिकार्ड की गई बातचीत के आधार पर ही एसटीएफ ने मौलाना खालिद को उठाया था। यह भी पता चला है कि मौलाना खालिद हिरासत में लिए जाने से पहले मुंबई गया था। मुंबई से जिस दिन लौटा उसी दिन क्वालिस सवारों ने उठा लिया। फिर भी मौलाना खालिद को हिरासत में लिए जाने की अधिकृत पुष्टि किसी ने नहीं की है। मड़ियाहूं कस्बे के महतवाना मोहल्ला निवासी मौलाना खालिद पिछले पांच वर्षों से घर के बगल में ही लड़कियों का मदरसा चला रहा है। इस मदरसे में प्राइमरी से लेकर आलमियत तक की शिक्ष दी जाती है। मदरसे में करीब दो सौ लड़कियां पढ़ती है। दस शिक्षक भी हैं। मौलाना खालिद इस मदरसे का हेड है। लड़कियों के लिए खालिद खालिद की छत पर हास्टल भी बना हुआ है। अधिसंख्य लड़कियां दूसरे जिलों की हैं। मौलाना खालिद अमरोहा में हाफिज व आलिम की डिग्री ले चुका है। उसके चाचा यह नहीं बता पाते कि खालिद अमरोहा के किस मदरसे का छात्र था। इलाके के लोगों का कहना है कि मौलाना खालिद के पिता स्व. जीमल आलम भी मजहबी शिक्ष के लिए चर्चित थे। मजहब के काम से वे अक्सर बाहर जाया करते थे। पिता के साथ खालिद भी जाता था। यह बात उसके चाचा व जमात-ए-इस्लामी के इलाहाबाद मंडल अध्यक्ष जहीर आलम फलाही भी मानते हैं। जहीर की माने तो पिछले पांच-छः महीनों से निगरानी ही रही थी। रिश्ता तय करने के नाम पर कुछ लोग खालिद के बारे में तहकीकात करने आए थे। धीरे-धीरे इन्हीं लोगों ने खालिद से सिमी के तालुकात के बारे में पूछताछ की थी। अज्ञात लोगों के पूछताछ के बारे में उन्होंने मड़ियाहूं कोतवाली के साथ बड़े अफसरों का भी अवगत कराया था। उसके बाद से तहकीकात बंद हो गई थी। यह नहीं बताया गया कि तहकीकात करने वाले लोग कौन थे। वे भी कभी सामने नहीं आए। पुलिस सूत्रों की मानें तो आईबी के लोग काफी दिनों से मौलाना की निगरानी कर रहे थे। आईबी की रिपोर्ट तो यह भी है कि खालिद तीन बार पाकिस्तान जा चुका है। उसे पहाड़ी इलाकों में पैदल चलने में महारथ हासिल है। पुलिस सूत्रों की मानें तो मौलाना खालिद आतंकियों के संपर्क में था। यह जांच का विषय है।

हिन्दुस्तान - 22.12.07 - दो महीने पहले ही हुआ था खालिद का निकाह

कचहरी ब्लास्ट के सिलसिले में पांच दिन से पुलिस के कब्जे में खालिद का निकाह महज दो माह पूर्व हुआ था। 15 दिन पहले ही दूसरी बार ससुराल आई शबनम का कहना है कि उसका शौहर खालिद बेकसूर है। शौहर पर उसे इतना भरोसा है कि उसने मायके जाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मुसीबत की इस घड़ी में ससुराल नहीं छोडूंगी। शबनम ही नहीं खालि का पूरा परिवार चिंतित है। बकरीद जैसी खुशी के मौके पर परिवार में नमाज के बाद खालिद को सकुशल वापसी के लिए दुआ मांगी। इस बीच चाचा जहीर ने आशंका जाहिर की कि पुलिस खालिद को मार सकती है। मां नाजिमा बंगम का रो-रोकर बुरा हाल है। कहती हैं कि खालिद सीधा-सादा इंसान है। पुलिस न जाने क्यों फंसाने में जुटी है।

मोहल्ले के बुजुर्ग शीतल जायसवाल और राम दुलार मौर्य खालिद के परिवार के पड़ोसी हैं। ये बताते हैं कि खालिद के दादा रज्जाक मुजाहिद इस्लाम धर्म के जानकार थे और प्रचार-प्रसार के सिलसिले में कई माह घर से बाहर रहा करते थे। रज्जाक की मृत्यु के बाद इनके दोनों पुत्र जहीर व जमीर आलम जमायत इस्लामी हिन्द के कद्दावर नेता हो गये।

जहीर आलम को तकरीर संजीदगी पूर्ण थी तो स्व0 जमीर आलम जोशीली तकरीर के लिए विख्यात थे। इन भाइयों का व्यवहार व आचरण नगर में साधारण ही था। मोहल्ले वाले मानते हैं कि अक्सर इस परिवार में जमात के चार-छः लोग आते-जाते रहते थे ।

समाचार पत्रों में लगातार 22.12.07 तक मो0 खालिद मुजाहिद को एसटीएफ द्वारा उठाये जाने की खबरें छपती रहीं, फिर भी 18.12.07 तथा 19.12.07 की बीच की रात में पुलिस क्षेत्राधिकारी चैक, लखनऊकाफी बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स लेकर मो0 खालिद के घर पहुंचे, कुछ किताबें उठायीं और थाना मड़ियाहूं में मो0 खालिद के चाचा मो0 जहीर आलम फलाही तथा मामू मो0 सिद्दीक को बलपूर्वक अपने साथ ले गये और डरा-धमकाकर सादे कागज पर हस्ताक्षर कराने के बाद मड़ियाहूं न छोड़ने के लिए ताकीद किया। इतना सब हो जाने के बावजूद दि0 22.12.07 को सुबह ६.0 बजे मो0 खालिद को भी बाराबंकी रेलवे स्टेशन के बाहर से मो0 तारिक के साथ गिरफ्तार किया जाना दिखाया गया है। मो0 तारिक कासमी तथा मो0 खालिद मुजाहिद ने क्रमशः 12.12.07 से 22.12.07 तक और 16.12.07 से 22.12.07 तक अपनी आप बीती लिखकर बयान किया है जो नीचे उद्धृत है -
‘‘मैं मो0 खालिद मुजाहिद पुत्र जमीर मुजाहिद, मोहल्ला महतवाना, मड़ियाहूं, जिला जौनपुर का रहने वाला हूं, 16.12.07 की शाम एस0टी0एफ0 मड़ियाहूं बाजार से दुकान पर से लोगों की मौजूदगी में उठाया और नामालूम जगह पर लेजाकर जबरदस्त तशद्दुद किया। मुखतलिफ तरीकों से मारा पीटा गया। दाढ़ी के बाल जगह-जगह से उखाड़े गये दोनों पैरों को चीर कर इस पर खड़े होकर अजू तनासुल को मुख में डालकर चुसवाना। पाखाने के रास्ते पेट्रोल डालना शर्म गाह को धागे से बांधकर दूसरे किनारे पर पत्तर बांध कर खड़ा कर देना और शर्मगाह पर सिगरेट छिड़कना। शराब पिलाना व सुअर के गोश्त का कबाब खिलाना, पेशाब पिलाना, बरफ लगाना, नाक और मुख से जबरदस्ती पानी पिलाना जिससे दम घुटने लगे। बिल्कुल सोने न देना वगैरह। एलेक्ट्रिल शोला मारते हुए आला के जरिये जिस्म को जलाना, करेन्ट चार्ज देना बिल्कुल नंग करके मुसलसल, वगैरह। इन्सानियत सोज हरकतें की गयी, बार-बार यह कहते थे कि जैसा हम कहते हैं वैसा नहीं कहोगे तो इससे भी बुरा हश्र करेंगे। आंख पर पट्टी बाुधकर कुद चीजें पकड़वायी गयी मुझे नहीं मालूम वह क्या था। जान से मारने की धमकी देकर बनाया हुआ एक बयान कैमरे के सामने कहने पर मजबूर किया गया और इस को अलग से टेप भी किया गया। (मुझे कचहरी सीरीयल ब्लास्ट में मुल्जिम बताया गया जबकि ऐसा नहीं है) 22.12.07 को बाराबंकी से धमाका खेज माद्दा के साथ शो किया गया (जबकि मुझे उठाया गया था मेरे पास कुछ भी नहीं था) और एक जगह ले जाकर बैग पर उंगलियांे के निशान लिये गये उस के बाद दो सादे कागज पर हाथ पैर की उंगलियों के निशान लिये गये उसके बाद एक लिखे हुए कपड़े पर जिसमें कोई चीज पैक थी, फिर बाराबंकी जेल भेज दिया गया वहां भी मारा-पीटा गया।

24.12.07 दस दिन की रिमान्ड पर लेकर एस0टी0एफ0 कार्यालय में रखा गया। दौराने रिमान्ड गैर इन्सानी सुलूक किया गया और शदीद जहनी व जिसमानी अन्दुरूनी चोट पहुचायी गयी जिसका बजाहिर किसी मेडिकल रिपोर्ट में आना मुहाल है दौराने रिमान्ड मेडिकल भी एस0टी0एफ0 कार्यालय में होता था डाक्टर को कोई भी बात बताने पर पाबन्दी थी। 17.1.08 को एस0टी0एफ0 कार्यालय में फैजाबाद के सी0ओ ने एस0टी0एफ0 के साथ मिलकर एक बैट्री पर एक प्लास्टिक के टुकड़े पर और एक किताब पर उंगलियों के निशान लिये। सादे कागज पर अंगूठे के निशान और दस्तखत लिये और हिन्दी में लिखे हुए कागज पर इस्तखत लिये और कहा कि सबूत ऐसे बनाएंगें कि फांसी तक पहुंचा देंगे। इसके अलावा बहुत सी नाजेबा बातें कही गयीं जिनका जुबान पर लाना बाइसे शर्म है। मै। मुहब्बे वतन शहरी हूं मेरा दहशतगर्दी या किसी दहशतगर्द तन्जीम से कोई ताल्लुक नहीं है। मुझे जबरदस्ती फंसाया जा रहा है, मैं बेकसूर हूं, मेरे ऊपर जो जुल्म हुआ उसको मुख्तसर में बयान कर दिया उम्मीद है कि आप हजरात इन्साफ दिलाने के लिए जद्दो-जहद करेंगें।

तमाम अखबारात व रसायल इसमें अहम किरदार अदा करें।

ऽ सीरीयल ब्लास्ट की तहकीक किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज से करायी जाये।

ऽ रिटायर्ड जजों की एक कमेटी बने जो दहशतगर्दी के इल्जाम में बन्द मुल्जिमों पर लगे इल्जामात की तहकीक करें और इन्साफ दें, ताकि जल्दी हो सके।

ऽ उन लोगों पर कार्यवाहियां हों जो लोगों को फजी गिरफ्तार करके जबरदस्ती कहलवाकर दहशतगर्द साबित करते है। और फर्जी सबूत और गवाह बनाकर कानून से खिलवाड़ करते हैं।

ऽ वकला हज़रात हमारा केस नहीं ले रहे है। उनसे गुजारिश है कि वह ऐसा न करें, आपका काम इन्साफ दिलाना है। किसी के जबरदस्ती कहलवा लेने और फर्जी सबूत बना लेने से कोई मुजरिम नहीं हो जाता। आप खुद तहकीक करें या करवायें मुझे इन्साफ की उम्मीद है।

मो0 खालिद मुजाहिद

हाई सिक्योरटी बैरक नं0 3

जिला जेल, लखनऊ
12 दिसम्बर, 2007 को हमारी दुकन से निकलने के बाद कौमी शाहरा हमीर रोड रास्ते से तकरीबन एक बजे एस0टी0एफ0, के जरिए (टाटा सूमो सफेद रंग) उठाया गया उस वक्त मैं हान्डा स्पलेन्डर यू0पी050/2943 से शहरामीर शरवा इज्तिमा की तैयारी और अपनी दुकान की कुछ दवाआंे की खरीददारी के लिए जा रहा था मेरे पास 11,000/- (ग्यारह हजार) रूपये अन्दर वाली जेब में और सामने वाली जेब में भ्ी तकरीबन 500/- रूपया, ड्राइविंग लाइसेन्स, पिंक कार्ड और दीगर कागजात थे, जिसमें जहरेज ट्रेवल्स का एक बिल भी था मुझको इस तरह अचानक गाड़ी में बिठाया कि मैं समझ न सका मैंने फित्री एहतियाज किया कि शायद इग्वा करने वालों का गिरोह है मैंने बहुत पूछा पर कोई जवाब नहीं मिला फरिहा बाजार तक मैं सराय एहतियाज बन गया मेरा हाथ बांध दिया गया और जेब से रकम और कागज निकाल कर खाली कर दिया गया और फरिहा चैक से गाड़ी मोहम्मदपुर मोउ़ पर मोड़ने पर मैंने कहा- ’’कहां ले जा रहे हो? कौन लोग हो?’’ तो टीम के लाडर बी0के0 सिंह ने गाली देकर कहा-‘‘इन्काउण्टर करने’’ मैंने कहा - ‘‘क्यों’’ तो उन्होंने डांटकर मना कर दिया और आंखों पर पट्टी बांधने का हुक्म जारी किया। मेरी आंखों पर पट्टी बांधी जा रही थी कि गाड़ी मोहम्मदपुर से बनारस वाले रोड पर घूम चुकी थी उसके बाद मुझको जदाकोब (मारना-पीटना) किया जाने लगा, हाथ बंधे होने की वजह से फितरी एहजिजाज भी नहीं कर पा रहा था, तो मैंने कल्मिा और दुआएं पढ़ना शुरू कर दिया इस पर भी मारते थे, यह सब मत पढ़ो, गालियां देते मारते हुए चले जा रहे थे कि किसी का फोन बजा और बात होने लगी तो समझ में आया कि बी0के0सिंह ही की आवाज है। चूंकि मैं बीच वाली सीट पर था और बी0के0 सिंह सामने वाली पर बस इतना समझ में आया कि ये कह रहा है, अच्छा सर इन्काउन्टर छोड़ दें आपके पास लाये। फिर उसने अपने साथियों को कहा कि बनारस पहुंचकर फौरन लखनऊ निकलना है, साहब ने लखनऊ बुलाया है। मुझको इस तरह फिर लखनऊ लाया गया पहली मुलाकात में जिसने पूछताछ शुरू की, उसने कहा ‘‘तुम आतंकवादी हो’’ मैंने कहा ‘‘सर, मैं सोच भी नहीं सकता और मैं तो मेडिकल प्रक्टिशनर हूं, समाज सेवा मेरा काम है।’’ वतन की मोहब्बत मेरा फरीज़ा तो उसने गाली देकर खामोश रहने को कहा ये सिलसिला चलता रहा वो बरसते रहे और मैं मुस्तकिल कहता रहा, सर मैं ऐसा नहीं हूं-चार रोज लगातार रातो दिन ये सिलसिला चलता रहा हर वक्त दस लोग या बारह लोग मुस्ल्लन रहते खाना और गजाए हाजत (पखाना-पेशाब) रोज बा के अलावा किसी चीज़ की इजाजत नहीं रहती, चार रोज बाद मैं नीममर्ग (अधमरा) हालत में था कि अचानक सारे लोग चले गये सिर्फ एक रह गया उसने कहा तारिक हमको मालूम है कि तुम मारे जाओगे अगर बचना है तो जो-जो तुमसे कहा जाय उसको कहो वरना आई0जी0 साहब कह रहे हैं उसको और अज़ियत (तकलीफ) दो और उसके बीबी बच्चों को भी उठा लो। आखिर तुम्हारे साथ बच्चे भी परेशान होंगे गर्जे की दो घण्टा मुझको कहता रहा कि तुम तैयार हो जाओ तो अभी दवा खिलाकर सुला दिया जायेगा। न सोने की वजह से मैं दिमागी होशो-हवास का अक्सर बके चुका था। मैंने कहा मुझको क्या कहना होगा उसने खुश होकर कहा तुम परेशान न हो कोई बड़ी बात नहीं है मेरी नींद आर दिली तकलीफ को बार-बार वो कहता कि अभी दवा और नींद देंगे फिर उसने सिपाहियों से कहा कि-उसको सुला दो मुझे दवा और खाना दिया गया। दूसरे रोज सुबह आई0जी0 और उनके साथ दस-बारह लोगों ने आकर मुझसे कहा कि ये लोग जो कहें उसको कहना मसलन ये कि 23 नवम्बर वाले सीरियल बम धमाकों में शामिल थे वगैरह उसके बाद सी0ओ0 आनन्द मिश्रा, दरोगा शुक्ला और जय प्रकाश नामी एस0पी0 से यह कहकर चला गया कि उसको किसी तरह मजीद तैयार कर लो अब साहब के पास पेश करना है, ये लोग मुझको पूरी कहानी रटाते थे फिर 21 दिसम्बर की रात हर बड़े-छोटे सरकारी अफसरान पूरी रात पूछताछ करते रहे और सुबह के वक्त चार पांच गाड़ियों के साथ हमको और खालिद को बाराबंकी स्टेशन ले गये फिर थाना ले गये इसके बाद किसी सरकारी गेस्ट हाउस में ले गये जहां पर पूरे दिन भर लिखा पढ़ी होती रही वहां पर हमारे हाथ और पैर पूरे-पूरे का निशान भी लिया गया उसके बाद बाराबंकी जेल भेज दिया गया फिर चैबीस को लखनऊ जेल लाये और मजिस्टेªट के सामने पेश करवाये और रिमाण्ड पर भी लिया। रिमाण्ड की मुद्दत दस रोज तकएस0टी0एफ0 आफिस में ही रहे पर अफसर सूबों के एजेन्सी वाले पूछताछ करने आये, फिर 2 जनवरी 2008 को लखनऊ जेल भेज दिया गया फिर नौ तारीख को रिमाण्ड पर ले गये और एस0टी0एफ0 आफिस ही में रखा गया जबकि रिमाण्ड राजेश पाण्डे के जरिए हुई थी जो सी0ओ0 फैजाबाद हैं। अजीयत रिसानी के साथ-साथ् पूछताछ करते रहे और अपनी बात मनवाने की जिद करते रहे और बयान दिलवाकर सी0डी0 वगैरह भी बनवायी गई। फिर 17 जनवरी 2008 रात में राजेश पाण्डे सी0ओ0 फैजाबाद और ओ0पी0 पाण्डेय ने पूरी रात पूछ ताछ करते हुए कुछ ऐसे काम करवाये जिससे हमको शक के हमारे फिंगर प्रिंट लिए गये हैं (जैसे-पतलनी वाली छोटी लाल रंग की बैट्री जिस पर शक्ति लिखा हुआ था उस पर कुछ ऐसा केमिकल लगा हुआ था जो हाथों पर चिपक रहा था)। बैट्री हमसे हाथ में लेने का कहा गया हम जब हाथ से लिए वो चिपक गयी फिर वापस ले लिए उसके बाद डाबर केवड़ा की 150 एम0एल0 की गोल बोतल जिसमें कोई चीज अन्दर थी उसको हाथ में दिया गया बल्कि जबरदस्ती पकड़ने को कहा गया, हमने मजबूरन पकड़ा, इसी तरह किताब पकड़वायी गई फिर आंखों पर पट्टी बांध दी गई मालूम नहीं कहां ले गये और वहां पर कई चीजों को पकड़वाये। आंखों पर पट्टी थी उसके बावजूद ये अन्दाजा लगा कि उसमें से कोई एक बैग वगैरह भी है जिसको पकड़वाया जा रहा है। इसके बाद सुबह (शहर) के वक्त 18 तारीख को हमारे बाल सर से खड़े उखाड़े गए और कागज में रखकर नाम लिखा गया फिर उसी रोज हमारी रिमाण्ड पूरी हो गई, धमकाते डराते हुए जेल वापस कर दिया गया।
पिछले साल भी 2007 में मई-जून में गोरखपुर, उससे पहले बनारस वगैरह, फिर दिल्ली ले जाने की बात भी कह रहे थे।

मो0 तारिक कासमी